लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर ही निशाना क्यों?
प्रदीप कुमार नायक
आज के आधुनिक दौर में मीडिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाज में घट रही घटनाओं को सामने लाने, शासन-प्रशासन से सवाल पूछने और जनता की आवाज को जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाने में पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। ऐसे में जब मीडिया की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठते हैं तो यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि इसके पीछे की परिस्थितियां क्या हैं और इसका प्रभाव लोकतंत्र पर किस प्रकार पड़ता है।
आजादी के बाद से मीडिया के स्वरूप में व्यापक बदलाव आया है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में समाचार-पत्रों ने जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद साक्षरता के विस्तार, समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या तथा रेडियो और टेलीविजन के विकास के साथ मीडिया का दायरा लगातार विस्तृत होता गया। समय के साथ मीडिया ने सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ व्यावसायिक स्वरूप भी ग्रहण किया। इसके बावजूद लोकतंत्र में उसकी निगरानी और जनहित की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रही।
निष्पक्षता पर उठते सवाल
मीडिया की निष्पक्षता लोकतांत्रिक पत्रकारिता का महत्वपूर्ण आधार है। यदि किसी मीडिया संस्थान या उसके संचालक पर किसी राजनीतिक विचारधारा अथवा दल के प्रति झुकाव के आरोप लगते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। लेकिन केवल मीडिया को जिम्मेदार ठहराने के बजाय यह भी समझना आवश्यक है कि पत्रकारिता किन आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में काम कर रही है।
मीडिया संस्थानों पर व्यावसायिक दबाव, विज्ञापन पर निर्भरता, राजनीतिक प्रभाव और प्रतिस्पर्धा जैसी परिस्थितियां पत्रकारिता के स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में मीडिया की स्वतंत्रता की चर्चा के साथ उसके आर्थिक और संस्थागत ढांचे पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ पत्रकारिता की भूमिका
भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को सामने लाना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक माना जाता है। जब कोई पत्रकार किसी मामले की पड़ताल करता है और तथ्य जनता के सामने रखता है, तो उसे कई प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि प्रत्येक मामले के तथ्यों और आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होती है, लेकिन पत्रकारों को केवल उनके पेशेवर कार्य के कारण धमकी, हिंसा या अनुचित दबाव का सामना न करना पड़े, यह लोकतांत्रिक समाज के लिए महत्वपूर्ण है।
पत्रकारों के विरुद्ध दर्ज होने वाली प्राथमिकी, धमकियों अथवा हिंसा के मामलों में कानून अपना काम करे और यदि कोई अपराध हुआ है तो निष्पक्ष जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से उसका निर्धारण होना चाहिए। इसी प्रकार किसी पत्रकार पर लगे आरोपों को भी बिना जांच के सही या गलत मान लेना उचित नहीं है।
आपातकाल का अध्याय
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में वर्ष 1975 में घोषित आपातकाल का दौर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। उस समय प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई थी और समाचारों के प्रकाशन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ गया था। इस दौर ने यह सवाल गंभीरता से सामने रखा कि स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक है।
आपातकाल समाप्त होने के बाद प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर देश में व्यापक चर्चा हुई। भारतीय पत्रकारिता ने समय-समय पर सत्ता, प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों को सामने रखा है।
पत्रकारों की सुरक्षा भी जरूरी
पत्रकारों के सामने आज भी सुरक्षा से जुड़े प्रश्न मौजूद हैं। विशेष रूप से अपराध, भ्रष्टाचार, राजनीति और संगठित गतिविधियों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को कई बार दबाव अथवा धमकी का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में कानून-व्यवस्था की निष्पक्ष और प्रभावी भूमिका आवश्यक है।
पत्रकार की हत्या, हिंसा या धमकी किसी भी परिस्थिति में गंभीर विषय है। किसी पत्रकार के खिलाफ अपराध होने पर त्वरित जांच, दोषियों की पहचान और कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है। इसी के साथ पत्रकारिता की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि प्रकाशित सामग्री तथ्यपरक, प्रमाणित और निष्पक्ष हो।
पत्रकार सुरक्षा कानून पर बहस
पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर पत्रकार संगठनों और विभिन्न मंचों पर विशेष कानून की मांग उठती रही है। इस विषय पर व्यापक और तथ्यपरक चर्चा की आवश्यकता है। ऐसा कोई भी कानूनी ढांचा पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ कानून के सामान्य सिद्धांतों और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने वाला होना चाहिए।
केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी प्रभावी क्रियान्वयन व्यवस्था, शिकायतों की निष्पक्ष जांच और पत्रकारों को पेशेवर कार्य के दौरान सुरक्षा उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
एकजुटता और जिम्मेदार पत्रकारिता
पत्रकारिता केवल अधिकारों का विषय नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का भी क्षेत्र है। पत्रकारों के बीच आपसी सहयोग, तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोतों की पुष्टि और पेशेवर आचार-व्यवहार लोकतांत्रिक पत्रकारिता को मजबूत करते हैं। किसी पत्रकार के साथ अन्याय होने पर तथ्य सामने लाना और कानूनी तथा लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाना पत्रकार समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी हो सकती है।
लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ स्वतंत्र मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और पत्रकारिता की विश्वसनीयता—इन तीनों विषयों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
अंततः सवाल केवल यह नहीं है कि मीडिया पर निशाना क्यों साधा जाता है। सवाल यह भी है कि मीडिया अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को कैसे मजबूत रखे, पत्रकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो और सत्ता तथा समाज के सभी प्रभावशाली वर्गों से निष्पक्ष सवाल पूछने की परंपरा कैसे कायम रहे।
लोकतंत्र में कलम की ताकत उसकी स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारी में भी निहित है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा की रक्षा करना केवल पत्रकार समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज का विषय है।

