
…….पण्डित प्रदीप शुक्ल
धर्म भारतीय समाज की आत्मा का एक गहरा और जीवंत हिस्सा रहा है। इसी देश में भक्ति ने कविता रची, करुणा ने संस्कृति गढ़ी, और आस्था ने जन-जीवन को एक व्यापक नैतिकता दी। लेकिन यही धर्म जब प्रदर्शन, उग्रता और शक्ति-प्रदर्शन का औज़ार बनने लगता है, तब वह श्रद्धा नहीं रहता; वह सार्वजनिक जीवन के लिए चुनौती बन जाता है। कांवड़ यात्रा इस समय इसी विरोधाभास का प्रतीक बनती जा रही है। एक ओर यह सावन की पुरानी, जनप्रिय और भावनात्मक रूप से गहरी धार्मिक परंपरा है, दूसरी ओर इसके नाम पर सड़क, बाजार, परिवहन और नागरिक अनुशासन पर जो दबाव बनता है, वह यह प्रश्न उठाता है कि आस्था की मर्यादा कहाँ समाप्त होती है और अराजकता की शुरुआत कहाँ से होती है। इस वर्ष कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक रही, और इसी दौरान दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में व्यापक ट्रैफिक डायवर्जन, स्कूल-छुट्टियाँ, भारी वाहन प्रतिबंध और अतिरिक्त पुलिस-व्यवस्था लागू की गई। मांस व शराब की दुकानों पर बंदी, मार्गों पर वाहन रोक, और सुरक्षा-घेरे की यह पूरी शृंखला बताती है कि यह अब केवल धार्मिक पदयात्रा नहीं, एक विशाल सार्वजनिक-प्रशासनिक घटना बन चुकी है।
संविधान की दृष्टि से भी प्रश्न स्पष्ट है। अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन वह यह स्वतंत्रता “public order, morality and health” की सीमाओं के अधीन देता है; वही अनुच्छेद राज्य को धार्मिक आचरण से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने का अधिकार भी देता है। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, और अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्वक, बिना हथियारों के, सभा करने तथा आवागमन का अधिकार देता है। इसलिए किसी धार्मिक आयोजन का सम्मान करना और उसके नाम पर सड़क पर हिंसा, धमकी, लूट, तोड़फोड़ या बाधा को सहना—दोनों अलग बातें हैं। राज्य का कर्तव्य श्रद्धा के लिए सुविधा देना है; राज्य का धर्म यह नहीं कि वह श्रद्धा के आवरण में किसी समूह को सार्वजनिक कानून से ऊपर रख दे।
इस साल की रिपोर्टें बताती हैं कि कांवड़ मार्गों पर अनेक स्थानों पर कड़े सुरक्षा उपायों के बावजूद टकराव की घटनाएँ सामने आईं। लखनऊ में एक स्कूल वैन पर कथित कांवड़ियों द्वारा हमला और तोड़फोड़ की घटना सामने आई; पुलिस के अनुसार वैन और मोटरसाइकिल की मामूली टक्कर के बाद विवाद हुआ, लेकिन नतीजा बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बन गया। हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में भी कारों पर हमले, वाहनों में तोड़फोड़ और आरोप-प्रत्यारोप की खबरें आईं। कुछ मामलों में पुलिस ने कार्रवाई भी की, लेकिन सार्वजनिक संदेश यही गया कि अनुशासन की अपेक्षा भीड़ के सामने कमजोर पड़ती दिखी। ऐसी घटनाएँ केवल “दुर्घटनाएँ” नहीं हैं; वे उस मानसिकता की ओर इशारा करती हैं जिसमें धार्मिक उत्साह को सार्वजनिक उत्तरदायित्व से ऊपर रख दिया जाता है।
यह भी कम चिंताजनक नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य-प्रशासन ने कांवड़ यात्रा के लिए असाधारण स्तर की सहूलियतें देना लगभग राजनीतिक परंपरा बना लिया है। कुछ स्थानों पर हेलीकाॅप्टर से फूल बरसाए जाते हैं, स्थानीय प्रशासन मार्गों के किनारे दुकानें बंद कराता है, भारी वाहनों पर रोक लगाता है, और कई बार पुलिस बल का व्यवहार कड़ी निगरानी के बजाय अतिउपचार जैसा दिखता है। इस वर्ष भी दिल्ली में भारी वाहन प्रतिबंध, उत्तर प्रदेश में स्कूल बंद, और अलग-अलग मार्गों पर व्यापक डायवर्जन लागू किए गए। इन उपायों का एक औचित्य है—भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा। लेकिन जब ये व्यवस्थाएँ एकतरफा “विशेषाधिकार” में बदलने लगें, और उसी के साथ हिंसा, अश्लीलता, सार्वजनिक हुड़दंग तथा कानून की अवमानना भी सामान्य मानी जाने लगे, तब प्रश्न प्रशासन का नहीं रह जाता; प्रश्न राज्य की राजनीतिक प्राथमिकता का हो जाता है।
आस्था का अर्थ कभी यह नहीं रहा कि वह नागरिक मर्यादा को कुचल दे। शिव की परंपरा स्वयं संयम, वैराग्य, अनुशासन और आत्मसंयम की परंपरा है; कांवड़ यात्रा यदि शिव-भक्ति का विस्तार है, तो उसमें भी वही गंभीरता, वही मर्यादा और वही आत्मनियंत्रण अपेक्षित होना चाहिए। परंतु सड़क पर डंडे, गाड़ियों पर लाठी, राहगीरों से बदसलूकी, पुलिस से धौंस, और “भक्ति” के नाम पर अश्लील प्रदर्शन—ये सब श्रद्धा नहीं, विकृति हैं। धार्मिक यात्रा यदि लोकजीवन को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि भय, अव्यवस्था और अपमान का कारण बनती है, तो वह अपने नैतिक आधार से दूर जा चुकी है। यह बात किसी एक धर्म, किसी एक समुदाय या किसी एक युग पर नहीं, बल्कि किसी भी धार्मिक आयोजन पर लागू होती है। धर्म की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि वह कितनी जोर से नारा लगवा सकता है; उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वह दूसरों के अधिकारों का कितना सम्मान करता है।
यहाँ आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रश्न भी अनिवार्य हो जाता है। भारतीय परंपरा में भक्ति का मर्म उत्सव से नहीं, आचरण से सिद्ध होता है। तीर्थ का अर्थ केवल यात्रा नहीं, अंतःकरण की शुद्धि भी है। यदि कांवड़िए, चाहे वे युवा हों या वृद्ध, अपने साथ संयम, करुणा और अनुशासन लेकर चलते हैं तो उनकी यात्रा समाज को जोड़ती है; लेकिन यदि वही यात्रा अहंकार, हठ, हिंसा और सार्वजनिक दादागीरी का मंच बन जाए, तो वह धर्म नहीं, प्रदर्शन रह जाती है। हमारे समाज की उदारता इसीलिए आज तक बची रही कि अधिकांश भारतीय श्रद्धा को शालीनता के साथ जीते रहे हैं। उसी शालीनता की रक्षा करनी होगी। धर्म का राज्यसत्ता से इतना घनिष्ठ संबंध भी ठीक नहीं कि वह जनता की निगाह में “कानून से ऊपर” प्रतीत होने लगे। आस्था का सम्मान तभी टिकता है जब वह नागरिक स्वतंत्रता के साथ समरस रहे; अन्यथा धर्म और लोकतंत्र के बीच टकराव गहराता है।
इस प्रवृत्ति का सामाजिक पक्ष और भी गंभीर है। कांवड़ मार्गों के कारण कई जगह छोटे व्यापारियों, सड़क किनारे काम करने वालों, स्कूलों, मरीजों, यात्रियों और दैनिक वेतनभोगियों की सामान्य जिंदगी बाधित होती है। कुछ दुकानदारों को बंदी झेलनी पड़ती है, कुछ वाहन फँसते हैं, कुछ स्कूल बंद होते हैं, और कुछ मरीजों को अस्पताल तक पहुँचने में विलंब होता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का दायित्व यह नहीं कि वह किसी एक यात्रा को दूसरे नागरिकों की सुविधा पर भारी पड़ने दे; उसका दायित्व है कि धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए। यही संवैधानिक शासन है। यदि सड़क पर कोई समूह धार्मिक भावावेश के नाम पर राहगीरों, छात्रों, एंबुलेंस या पुलिस पर धौंस जमाता है, तो उसे “श्रद्धालु” कहकर छोड़ा नहीं जा सकता। उसे कानून के अधीन लाना होगा—क्योंकि कानून के सामने भक्ति और अश्रद्धा, दोनों समान हैं।
सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिन यात्रियों की हिंसा या अभद्रता से सबसे अधिक पीड़ा स्थानीय नागरिकों को होती है, वे भी प्रायः उसी समाज के सामान्य लोग होते हैं। इसलिए यह किसी “हिंदू-विरोध” की भाषा का मामला नहीं, बल्कि हिंदू समाज के भीतर से उठने वाली आत्मालोचना का प्रश्न है। धार्मिक जीवन की शुचिता बचानी है तो सबसे पहले पाखंड, उपद्रव और प्रदर्शनवाद को अस्वीकार करना होगा। इस आलोचना का आशय श्रद्धा पर प्रहार नहीं, श्रद्धा की रक्षा है। जिस धर्म को राज्यसत्ता का खुला प्रोत्साहन मिलता है, उसमें आक्रामकता का खतरा बढ़ता है; और जिस धर्म को सामाजिक मर्यादा का अनुशासन मिलता है, वह लोकमंगल का स्रोत बनता है। यही भेद आज निर्णायक है।
इसलिए समय आ गया है कि कांवड़ यात्रा के नाम पर बनने वाली राजनीतिक छूट, प्रशासनिक झुकाव और सामाजिक चुप्पी—तीनों पर पुनर्विचार हो। श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएँ देना गलत नहीं; गलत यह है कि सुविधा धीरे-धीरे विशेषाधिकार में बदल जाए। आस्था का सम्मान आवश्यक है; पर नागरिक मर्यादा उससे भी अधिक आवश्यक है। कांवड़ यात्रा को यदि सचमुच शिव-भक्ति का पवित्र रूप बने रहना है, तो उसे भय, हिंसा, अश्लीलता और धौंस से मुक्त होना होगा। अन्यथा यह हर वर्ष एक ऐसी परीक्षा बनती रहेगी जिसमें धर्म की कसौटी पर नहीं, लोकतंत्र की सहनशीलता पर प्रश्न उठता रहेगा। और लोकतंत्र का उत्तर अंततः यही होना चाहिए—आस्था के लिए जगह है, अराजकता के लिए नहीं।
