भारतीय राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा शुरू किया गया “छात्रों की गूंज” अभियान अब केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश के शैक्षणिक, वैचारिक और लोकतांत्रिक ढांचे में एक गहरी हलचल पैदा करने वाला जन-आंदोलन बनता जा रहा है। कोटा से शुरू हुआ यह कारवां देहरादून, प्रयागराज, पुणे और अब इंदौर तक पहुंचते-पहुंचते सत्ताधारी दल के उस सुरक्षा चक्र को भेद चुका है, जिसे पिछले एक दशक से अजेय माना जा रहा था। यह कार्यक्रम केवल सरकार की विफलताओं को उजागर करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उस दमित युवा वर्ग की मुखर अभिव्यक्ति है जो वर्षों से अपनी आजीविका, शिक्षा और भविष्य को लेकर हाशिए पर धकेल दिया गया था।
संवैधानिक, विधिक और लोकतांत्रिक आयाम: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सत्ता का संकुचन
भारतीय संविधान का “अनुच्छेद 19(1)(a)” देश के प्रत्येक नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात में निहित है कि वहां सत्ता की आलोचना और उस पर तीखा व्यंग्य करने की छूट हो। हरिशंकर परसाई ने सही लिखा था कि तानाशाह हमेशा मसखरों से डरता है, क्योंकि व्यंग्य उसकी कृत्रिम भव्यता के गुब्बारे में सुई चुभोकर उसकी पोल खोल देता है। इंदौर के कार्यक्रम में हास्य कलाकार पुलकित मणि के प्रस्तुतिकरण पर भाजपा और उसके वैचारिक सहयोगियों की तिलमिलाहट इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक सहनशीलता का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है।
जब लोकतांत्रिक संस्थाओं—चाहे वह न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग या संसद—पर वैचारिक नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास होते हैं, तब असहमति के स्वरों को कुचलना सत्ता की मजबूरी बन जाता है। राहुल गांधी के मंच पर छात्रों, पीड़ितों और कलाकारों को बिना किसी डर के अपनी बात रखने का अवसर मिलना, संविधान की मूल भावना ‘हम भारत के लोग’ को जीवंत करता है। इसके विपरीत, व्यवस्था का विरोध करने वाले छात्रों को राष्ट्रविरोधी करार देना या उमर खालिद जैसे मामलों में विधिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करना संवैधानिक अधिकारों के हनन का खुला दस्तावेज है।
सामाजिक, जनहित और राष्ट्रहित के धरातल पर वास्तविकता
देश का राष्ट्रहित इस बात में निहित है कि उसकी विशाल युवा आबादी (Demographic Dividend) को सही दिशा, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार मिले। आज स्थिति यह है कि 45 वर्षों में सबसे उच्च स्तर पर पहुंची बेरोजगारी ने युवाओं की रीढ़ तोड़ दी है। 2014 में हर साल दो करोड़ नौकरियों का जो वादा किया गया था, वह कोरे जुमले में तब्दील हो चुका है।
हाल ही में दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में बहुमंजिला इमारत गिरने से हुई निर्दोष छात्रों की मौत कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक और व्यवस्थागत लाचारी का परिणाम है, जो देश के छोटे शहरों और गांवों से आने वाले छात्रों को सुरक्षित और किफायती हॉस्टल देने में पूरी तरह विफल रही है। छात्रों को मजबूरन खतरनाक, दड़बेनुमा कमरों में भारी-भरकम किराए पर अपनी जान जोखिम में डालकर रहना पड़ रहा है।
इसके साथ ही, डिजिटल इकोनॉमी के नाम पर आम जनता और छोटे दुकानदारों पर यूपीआई (UPI) जैसे माध्यमों के जरिए आर्थिक बोझ डालने की नीतियां जनहित के बिल्कुल विपरीत हैं। एक तरफ नागरिकों को त्याग और मितव्ययिता के उपदेश दिए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ वीआईपी संस्कृति और आयोजनों पर बेहिसाब धन बहाया जाता है। यह कथनी और करनी का भारी अंतर आज का युवा साफ-साफ देख रहा है।
वैचारिक टकराव और ‘अंधभक्ति’ बनाम ‘सचेत नागरिक’
राहुल गांधी ने इंदौर और पुणे के मंचों से जिस ‘सिस्टम’ का खाका खींचा, वह केवल कुछ चेहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक कार्यप्रणाली है। इस मॉडल में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-निर्धारकों और कॉर्पोरेट घरानों के गठजोड़ को सुरक्षित रखने के लिए एक ऐसा वर्ग तैयार किया गया है, जिसे तार्किक बहसों से दूर रखकर ‘अंधभक्ति’ की परिधि में बांध दिया जाता है।
मनुस्मृति और संकुचित सामाजिक प्रणालियों के संदर्भ देकर राहुल गांधी ने उस वैचारिक पृष्ठभूमि पर सीधा प्रहार किया है जो समाज में ऊंच-नीच और असमानता को बढ़ावा देती है। जब-जब वंशवाद और ‘पप्पू’ जैसे अपमानजनक विशेषणों से राहुल गांधी की छवि को धूमिल करने के प्रयास किए गए, तब-तब जनता ने उनकी इस सहजता, संवेदनशीलता और जनता के बीच सीधे घुलने-मिलने की कला को उनकी सबसे बड़ी ताकत के रूप में देखा। राजवंश की विरासत से निकलकर जन-संघर्ष की जमीन पर खड़े होने की यह यात्रा उनके विरोधियों के पास मौजूद हर पैंतरे को बेअसर कर रही है।
“फर्जी राष्ट्रवाद के मुखौटों से अब पर्दा उठ रहा है, दड़बेनुमा कमरों में घुटता युवा अब व्यवस्था के महलों को हिला रहा है!”