2साल D.pharmaकिया4 साल प्रैक्टिस किया, . 2 से 4 लाख रुपये अपनी पढ़ाई पर फूंक दिए। और आज सरकार चाहती है कि हम अपनी दुकानों पर सिर्फ डायपर, तेल,साबुन,और कंडोम बेचें?

यह दर्द, यह तीखा आक्रोश और आँखों में तैरती बेबसी आज देश के किसी एक मेडिकल स्टोर संचालक की नहीं है। यह कहानी है देश के लाखों उन मध्यम और छोटे केमिस्ट भाइयों की, जो आज अपनी ही ईमानदारी और डिग्री के बोझ तले दबे जा रहे हैं।
सरकार ने नियम बना दिया—बिना डॉक्टर के पर्चे (Prescription) के कोई एंटीबायोटिक या कफ सिरप नहीं बिकेगा।
कागज़ पर यह नियम बहुत खूबसूरत है। सुपरबग का खतरा टलेगा, लोग बिना सोचे-समझे दवाइयाँ नहीं खाएंगे, नशामुक्त समाज बनेगा। सुनने में कितना अच्छा लगता है न? लेकिन साहब, ज़मीन पर आकर देखिए, जहाँ हकीकत के पैर में छाले पड़े हुए हैं!
एक छोटा या मध्यम मेडिकल स्टोर सिर्फ दवा बेचने की दुकान नहीं होती, वो ग्रामीण और कस्बाई भारत का पहला अस्पताल होता है। जब रात के 12 बजे किसी गरीब के बच्चे को तेज़ बुखार आता है, या किसी मजदूर के सीने में खांसी का दौरा उठता है, तब वो शहर के बड़े अस्पताल में 500 रुपये की फीस और 2 घंटे की लाइन लगाने नहीं जाता। वो भागकर अपने मोहल्ले के उसी फार्मासिस्ट के पास जाता है, जिसे वो डॉक्टर साहब कहता है।
आज उस फार्मासिस्ट के हाथ बांध दिए गए हैं। उसकी कमाई का मुख्य ज़रिया—यही कफ सिरप और सामान्य एंटीबायोटिक्स थे। अचानक आए इस कड़े नियम ने उनकी रोज़ी-रोटी पर ऐसा संकट खड़ा कर दिया है कि कई दुकानदार अपनी एक्सपायरी की तरफ बढ़ती दवाइयाँ फेंकने पर मजबूर हैं। लाखों का लोन लेकर, सालों काली रातें जागकर जिसने डिग्री ली, आज वो काउंटर पर बैठकर सिर्फ लाचारी से ग्राहकों को लौटते हुए देख रहा है।
अगर हर छोटी चीज़ के लिए डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य है, तो पहले देश के हर गांव, हर कस्बे में MBBS डॉक्टर खड़े तो कीजिए! जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ताले लटके हों, वहाँ एक फार्मासिस्ट ही लोगों की उम्मीद होता है।
हम जनस्वास्थ्य के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सुधार के नाम पर किसी का चूल्हा बुझा देना कहाँ का न्याय है?
अगर सरकार वाकई गंभीर है, तो बीच का रास्ता निकालिए। विदेशों की तरह क्वालिफाइड फार्मासिस्ट्स (B.Pharma/M.Pharma) को ‘कम्युनिटी फार्मासिस्ट’ का दर्जा देकर कुछ बुनियादी और सुरक्षित दवाइयाँ देने का कानूनी अधिकार दीजिए। उन्हें व्यवस्था का हिस्सा बनाइए, उन्हें मुजरिम मत समझिए!
आज देश का फार्मासिस्ट सिर्फ दवा नहीं बेच रहा, वो अपनी साख और अपने परिवार के वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। सरकार को इनके इस मौन और मार्मिक आक्रोश को सुनना ही होगा।
