…….पण्डित प्रदीप शुक्ल

देश में महंगाई अब कोई क्षणिक समस्या नहीं रह गई है, वह एक स्थायी जन-पीड़ा में बदलती जा रही है। केंद्र सरकार के आत्मविश्वासी दावों, विकास के ऊँचे नारों और “डबल इंजन” की राजनीतिक भाषा के बीच आम नागरिक की रसोई, जेब और जीवन-शैली पर जो दबाव बन रहा है, वह किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए गंभीर चेतावनी होना चाहिए। जिस डबल इंजन सरकार को गति, समन्वय और विकास का प्रतीक बताया गया था, उसी दौर में अगर महंगाई भी “डबल अटैक” की तरह जनता पर टूट पड़े, तो यह केवल आर्थिक विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत संवेदनहीनता का भी संकेत है।
सरकारी आंकड़े स्वयं इस संकट की पुष्टि कर रहे हैं। खुदरा महंगाई पहले ही भारतीय रिज़र्व बैंक के लक्ष्य-सीमा को पार कर चुकी है और अब थोक महंगाई भी अपेक्षा से कहीं अधिक चढ़ गई है। जून में होलसेल प्राइस इंडेक्स यानी थोक महंगाई दर 9.87 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो मई में 9.68 प्रतिशत थी। यह लगातार बढ़ती हुई महंगाई का ऐसा सिलसिला है, जिसमें राहत की कोई स्पष्ट दिशा दिखाई नहीं देती। खुदरा और थोक—दोनों स्तरों पर कीमतों का यह उभार बताता है कि संकट केवल बाजार का नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की गुणवत्ता का भी है।
महंगाई का सबसे तीखा असर खाद्य वस्तुओं पर पड़ता है। जब दाल, तेल, अनाज, सब्ज़ी, दूध, गैस, पेट्रोल और रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुएँ महँगी होती हैं, तो सबसे पहले गरीब, निम्न-मध्यम वर्ग और वेतनभोगी परिवार टूटते हैं। वे लोग, जिनकी आय पहले ही सीमित है, अपने खर्च में कटौती करके केवल जीवन बचाने की जद्दोजहद में लग जाते हैं। इसीलिए महंगाई केवल आर्थिक सूचकांक नहीं, सामाजिक असमानता का भी आईना है। वह बताती है कि किसकी थाली छोटी हो रही है और किसकी सुविधा बड़ी।
सरकार के समर्थक अक्सर यह तर्क देते हैं कि महंगाई के पीछे बारिश की कमी, अल नीनो, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति-श्रृंखला की चुनौतियाँ हैं। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। फसलों पर मौसम का असर, ईंधन मूल्य में उतार-चढ़ाव और आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था की सीमाएँ किसी भी सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर नहीं होतीं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सरकार केवल कारण गिनाने के लिए है, या उन कारणों के बीच राहत का रास्ता निकालने के लिए भी है?
यही वह बिंदु है जहाँ जवाबदेही शुरू होती है। सरकार का काम केवल यह बताना नहीं है कि महंगाई क्यों बढ़ी; उसका दायित्व यह भी है कि वह बताए कि इसे रोका कैसे जाएगा, गरीब को राहत कब मिलेगी, और बाज़ार में स्थिरता कैसे लाई जाएगी। आंकड़े जारी कर देना प्रशासनिक कर्तव्य हो सकता है, लेकिन जनता की चिंता दूर करना शासकीय नैतिकता की कसौटी है। जब कोई सरकार बार-बार यह कहे कि सब नियंत्रण में है, और दूसरी ओर जनता हर महीने अपनी क्रय-शक्ति खोती जाए, तो संवाद और यथार्थ के बीच का फासला बहुत खतरनाक हो जाता है।
आम तौर पर यह भी देखा गया है कि संकट के समय शासन की भाषा बदल जाती है। जब तेल महँगा होता है, तो नेता साइकिल चलाते हैं; जब जनता पर बोझ बढ़ता है, तो प्रतीकात्मक सहानुभूति के फोटो-ऑप दिए जाते हैं; और जब असली राहत का सवाल आता है, तो वही सरकार प्रशासनिक विवशताओं की आड़ में खड़ी हो जाती है। लेकिन जनता अब प्रतीकों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होती है। उसे भाषण नहीं, राहत चाहिए; फोटो नहीं, नीति चाहिए; और योजनाओं के नाम नहीं, उनके वास्तविक लाभ चाहिए।
यह प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि क्या सरकारी खर्चों की प्राथमिकताओं में संतुलन है? जब सार्वजनिक आयोजनों, प्रचार, दिखावे और प्रतीकात्मक प्रदर्शन पर बेहिसाब धन खर्च होता है, तब यह स्वाभाविक रूप से पूछा जाएगा कि क्या उसी धन का उपयोग कीमतों पर नियंत्रण, आपूर्ति-श्रृंखला सुदृढ़ करने, कृषि संकट से जूझ रहे किसानों को मदद देने, या गरीब परिवारों के लिए अधिक प्रभावी सुरक्षा-जाल बनाने में नहीं किया जा सकता था? शासन का सौंदर्य सजावट में नहीं, संवेदना में होता है। उसकी प्रतिष्ठा मंचों की ऊँचाई से नहीं, जनता की थाली में बचे अनाज से तय होती है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाएँ निश्चित रूप से राहत का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी हैं। करोड़ों लोगों तक मुफ्त राशन पहुँचना अपने आप में कम उपलब्धि नहीं है। कोविड संकट के बाद इससे बड़ी आबादी को भुखमरी से कुछ सुरक्षा मिली, यह भी मानना होगा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल पांच किलो अनाज को ही विकास की पूर्ण परिभाषा मान लिया जाए? क्या मुफ्त राशन किसी गरीब को सम्मानजनक जीवन दे देता है, या केवल उसके संकट को थोड़ी देर के लिए टालता है? असली विकास वह है जिसमें नागरिक को सहायता के साथ अवसर मिले, और सहायता के साथ आत्मनिर्भरता भी। महंगाई जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को विलासिता में बदलने लगे, तब यह सवाल और तीखा हो जाता है।
आज स्थिति यह है कि रोटी, कपड़ा और मकान, जो कभी न्यूनतम आवश्यकता माने जाते थे, वे भी अनेक परिवारों के लिए कठिन लक्ष्यों में बदलते जा रहे हैं। यही वह सामाजिक यथार्थ है जो किसी भी विकास-गाथा को चुनौती देता है। आर्थिक आंकड़ों की चमक तब तक अर्थपूर्ण नहीं है, जब तक उससे आम आदमी के जीवन में स्थायित्व, सुरक्षा और राहत न झलके। महंगाई का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता; वह शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, दवा, परिवहन और परिवार के भविष्य तक को प्रभावित करता है। यही कारण है कि महंगाई का प्रश्न एक अर्थशास्त्रीय विषय भर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है।
सरकार को चाहिए कि वह महंगाई को प्राकृतिक आपदा की तरह स्वीकार करके पल्ला न झाड़े, बल्कि इसे नीति-चूक की तरह देखे। खाद्य वस्तुओं के भंडारण, वितरण, जमाखोरी, बाजार-नियमन, आयात-निर्यात की नीति, कृषि उत्पादन, ईंधन कर-ढांचे और सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकताओं पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। केवल मौद्रिक नीति से यह संकट नहीं सुलझेगा। रिज़र्व बैंक की ब्याज दरों और अनुमानित मुद्रास्फीति के बीच जो गणित चलता है, वह अंततः आम आदमी की जेब में जाकर टूटता है। इसलिए सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच बेहतर समन्वय के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति भी चाहिए।
महंगाई की तुलना यदि सुरसा से की जाए, तो यह इसलिए सार्थक है कि यह एक ही दिशा से नहीं आती। यह कहीं से भी, किसी भी बहाने से, किसी भी रूप में सामने आ सकती है—कभी खाद्य वस्तुओं के रूप में, कभी ईंधन के रूप में, कभी परिवहन लागत के रूप में, कभी दवाइयों और सेवाओं के रूप में। इसलिए जनता के लिए यह सवाल महज थोक और खुदरा महंगाई के आंकड़ों का नहीं है; सवाल यह है कि सत्ता अपने दायित्व को कितनी गंभीरता से निभा रही है।
यह समय आत्ममुग्ध दावों का नहीं, आत्मसमीक्षा का है। सरकार को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल जीडीपी के आँकड़ों, निवेश सम्मेलनों, और प्रचार अभियानों से सिद्ध नहीं होती। असली परीक्षा उस समय होती है जब सामान्य नागरिक को बाज़ार में राहत मिले, रसोई में स्थिरता मिले, दवा खरीदने में हिचक न हो, और भविष्य को लेकर भय कम हो। लोकतंत्र का मूल्यांकन इस बात से होगा कि वह सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में कितनी सहजता ला सका।
महंगाई आज केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा है। यदि सरकार इस परीक्षा में विफल रहती है, तो उसका विकास-विमर्श खोखला साबित होगा। जनता अब केवल नारों से नहीं बहकेगी; वह अपने जीवन की सच्चाई से निर्णय करेगी।
“डबल इंजन का दावा तब खोखला हो जाता है, जब रफ्तार प्रगति और आमजनता के खुशहाली की नहीं, महंगाई की बढ़ रही हो।”
