
….पण्डित प्रदीप शुक्ल
तीन विधानसभा उपचुनावों के आधिकारिक परिणाम साफ़ हैं: बिहार के बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने भाजपा के नीरज कुमार को 19,324 वोटों से हराया; मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से पराजित किया; और गुजरात के मांजलपुर में भाजपा के सतेंद्रभाई पटेल (सतीश पटेल) ने कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को 30,630 वोटों से हराकर सीट बरकरार रखी। ईसीआई की आधिकारिक गिनती के मुताबिक बांकीपुर में किशोर को 64,151, भाजपा को 44,827 और आरजेडी को 14,273 वोट मिले; दतिया में कांग्रेस को 66,757 और भाजपा को 60,741 वोट मिले; मांजलपुर में भाजपा को 55,481 और कांग्रेस को 24,851 वोट मिले।
यही तथ्य इस बहस की शुरुआत हैं और यहीं से उसका संतुलन भी बनता है। इन तीन नतीजों को एक ही लेंस से पढ़ना उचित नहीं होगा। मांजलपुर में भाजपा ने अपनी सीट बचा ली; दतिया में कांग्रेस ने वापसी की; और बांकीपुर में भाजपा का तीन दशक पुराना गढ़ टूट गया। यानी तस्वीर न भाजपा की पूर्ण हार है, न विपक्ष की सर्वांगीण जीत; यह एक मिश्रित, लेकिन राजनीतिक रूप से अर्थपूर्ण जनादेश है।
बांकीपुर का परिणाम इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक उपचुनाव नहीं, भाजपा के एक लंबे किले पर चोट है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह सीट लगभग तीन दशक से भाजपा के कब्जे में थी, और यह सीट भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से जुड़ी रही है, जिनकी आधिकारिक पहचान भाजपा की वेबसाइट पर राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दर्ज है। ऐसे में इस सीट का जाना संगठनात्मक, प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक—तीनों स्तरों पर भाजपा के लिए झटका है।
लेकिन बांकीपुर को केवल “प्रतीकात्मक जीत” कहकर भी छोटा नहीं किया जा सकता। आधिकारिक आंकड़ों में प्रशांत किशोर की बढ़त न केवल निर्णायक है, बल्कि इतनी बड़ी है कि उसे किसी संयोग का परिणाम नहीं कहा जा सकता। तीसरे स्थान पर रहे आरजेडी उम्मीदवार को मिले “14,273” वोटों से भी विजयी अंतर अधिक है; इसलिए यह जीत केवल विरोध-मत के बिखराव की देन नहीं लगती। यह एक स्वतंत्र राजनीतिक दावा है, जिसका भाजपा को गंभीरता से मूल्यांकन करना होगा।
बांकीपुर में एक और तथ्य उपेक्षित नहीं किया जा सकता: इस उपचुनाव में मतदान ‘जस्ट 34 प्रतिशत से थोड़ा ऊपर’ रहा। कम मतदान वाले चुनावों में संगठित समर्थन, सक्रिय अभियान और पहचान-आधारित राजनीतिक ऊर्जा का असर अधिक दिखाई देता है। इसलिए इस नतीजे को राष्ट्रीय जनमत का अंतिम और सर्वथा प्रतिनिधि प्रमाण कहना गलत होगा, लेकिन इसे मामूली भी नहीं माना जा सकता। यह भाजपा के लिए चेतावनी है कि उसके परंपरागत शहरी दुर्ग भी अब अजेय नहीं रहे।
दतिया का संदेश अलग है। वहाँ कांग्रेस ने सीट बचाई, और आधिकारिक गणना बताती है कि उसका अंतर “6,016 वोटों” का था। यह जीत कांग्रेस के लिए इसलिए मूल्यवान है क्योंकि यह उस राज्य में आई है जहाँ भाजपा की सत्ता और संगठन दोनों मज़बूत माने जाते हैं। दतिया यह दिखाता है कि स्थानीय संगठन, प्रत्याशी की विश्वसनीयता और बूथ-स्तर की मेहनत अब भी निर्णायक है; केवल राष्ट्रीय हवा से सब कुछ तय नहीं होता।
मांजलपुर ने भाजपा को राहत दी, लेकिन वह राहत आत्मतुष्टि का आधार नहीं बन सकती। वहाँ भाजपा को “55,481” वोट मिले, कांग्रेस को “24,851”, और जीत का अंतर “30,630” रहा। यानी गुजरात की यह सीट भाजपा के पास बनी रही, पर बैंकिपुर जैसी टूट यहां नहीं हुई तो यह पार्टी के लिए संतुलन का कारण है, complacency का नहीं। यही वजह है कि तीनों नतीजों को एक साथ पढ़ने पर तस्वीर अधिक साफ़ होती है: भाजपा दो सीटों पर झुकी, एक पर टिकी; कांग्रेस एक पर लौटी, एक पर ठहरी; और प्रशांत किशोर ने एक पुराने किले में प्रवेश किया।
संवैधानिक दृष्टि से उपचुनावों का यही महत्त्व है। वे सरकार गिराने या बनाने का अंतिम जनादेश नहीं होते, लेकिन वे लोकतंत्र के नियमित “audit” होते हैं। मतदाता यह नहीं कहता कि सत्ता अब समाप्त हो गई; वह यह कहता है कि सत्ता को अपने प्रदर्शन की फिर से परीक्षा देनी होगी। इस अर्थ में बांकीपुर का परिणाम भाजपा के लिए चेतावनी है, न कि अंतिम पराजय। दतिया कांग्रेस के लिए अवसर है, और मांजलपुर भाजपा के लिए रक्षात्मक साक्ष्य।
मीडिया की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण है। अलग-अलग अखबारों ने अलग-अलग पहलू उभारे, और यह स्वाभाविक भी है। जहाँ किसी संपादक ने “भाजपा का किला ढहा” शीर्षक चुना, वहाँ ड्रामा अधिक दिखा; जहाँ किसी ने “प्रशांत किशोर का चमत्कार” लिखा, वहाँ व्यक्ति-केन्द्रित राजनीतिक कथा बनी; और जहाँ किसी ने तीनों नतीजों का संतुलित ब्योरा दिया, वहाँ लोकतांत्रिक यथार्थ अधिक साफ़ दिखा। पत्रकारिता का काम केवल विजेता का नाम बताना नहीं, यह समझाना भी है कि किस जीत का राजनीतिक मूल्य क्या है। इस कसौटी पर बांकीपुर की खबर बड़ी है, दतिया की वापसी भी और मांजलपुर की बरकरार जीत भी।
इस पूरे प्रसंग का बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष यह है कि कोई पार्टी अब किसी सीट को जन्मसिद्ध अधिकार की तरह नहीं मान सकती। भाजपा के लिए यह चेतावनी है कि परंपरागत गढ़ भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं; कांग्रेस के लिए संकेत है कि स्थानीय मेहनत अब भी काम करती है; और जन सुराज के लिए यह कि संगठनात्मक राजनीति में प्रवेश अब केवल भाषण का मामला नहीं, वास्तविक चुनावी शक्ति का प्रश्न बन चुका है।
और एक आख़िरी बात भी उतनी ही ज़रूरी है। उपचुनावों के नतीजे चुनाव-प्रणाली पर चल रहे बड़े विवादों को अपने-आप हल नहीं करते। वे न तो यह सिद्ध करते हैं कि सब कुछ पूरी तरह ठीक है, और न यह कि सब कुछ पूरी तरह दूषित। वे बस इतना बताते हैं कि जनता, कम-से-कम अब भी, जहाँ मौका मिलता है वहाँ अपने तरीके से राजनीतिक संदेश देना जानती है। यही लोकतंत्र की बची हुई शक्ति है, और यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी।
“बांकीपुर ने भाजपा की अजेयता तोड़ी, दतिया ने कांग्रेस को सांस दी, और मांजलपुर ने भाजपा को याद दिलाया कि जीतें भी परीक्षा होती हैं।”
