
…….पण्डित प्रदीप शुक्ल
“शिक्षा, रोजगार और परीक्षा-व्यवस्था पर बढ़ता छात्र असंतोष आखिर किसकी जवाबदेही तय कर रहा है?”
किसी भी राष्ट्र के भविष्य का सबसे विश्वसनीय आईना उसके युवाओं की आंखों में दिखाई देता है। उनके सपनों में देश की दिशा पढ़ी जा सकती है और उनकी बेचैनी में शासन की प्राथमिकताओं का हिसाब। भारत जैसे युवा देश में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि सत्ता युवाओं को केवल चुनावी आंकड़े मानती है या उन्हें नागरिक, विद्यार्थी, श्रमिक, शोधकर्ता, उद्यमी और लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार के रूप में देखती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के बाद से अनेक अवसरों पर भारत की युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी शक्ति और जनसांख्यिकीय क्षमता के रूप में रेखांकित किया। ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और रोजगार-सृजन के अनेक वादों ने एक पूरी पीढ़ी के सामने अवसरों से भरे नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत की। स्वाभाविक था कि देश का युवा इस राजनीतिक भाषा से आकर्षित हुआ। उसे लगा कि शिक्षा का विस्तार होगा, रोजगार के नए क्षेत्र खुलेंगे, उद्यमिता को गति मिलेगी और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था अधिक पारदर्शी तथा विश्वसनीय बनेगी। लेकिन लोकतंत्र में वादों की उम्र सीमित होती है; उनकी जगह परिणाम ले लेते हैं।
आज भारतीय युवा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बात सत्ता ने वर्षों तक की, वह आखिर रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, कौशल और सम्मानजनक अवसरों में कितना बदल पाया है?
यहाँ आंकड़े नारे से अधिक कठोर होते हैं। सरकार के PLFS-2025 के अनुसार 15-29 वर्ष के युवाओं की सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत रही। शहरी युवाओं में यही दर 13.6 प्रतिशत और शहरी युवा महिलाओं में 18.9 प्रतिशत थी। यानी केवल ‘बेरोजगारी’ का राष्ट्रीय औसत देखकर युवा संकट की पूरी तस्वीर समझना संभव नहीं है; शहरी, शिक्षित और विशेषकर महिला युवाओं के सामने अवसरों का संकट कहीं अधिक तीखा है और यही वह जगह है जहाँ राजनीतिक विमर्श को प्रचार की भाषा से बाहर निकलकर वास्तविकता की भाषा में प्रवेश करना होगा।
समस्या केवल बेरोजगारी नहीं, अवसरों की असमानता भी है
भारत में युवाओं का संकट केवल यह नहीं है कि कितने लोग बेरोजगार हैं। असली संकट यह है कि कितने ऐसे युवा हैं जो वर्षों की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और परिवार की आर्थिक बचत खर्च करने के बाद भी स्थायी और सम्मानजनक रोजगार तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
* कितने युवा ऐसी नौकरियों में हैं जो उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं हैं?
* कितने स्नातक प्रतियोगी परीक्षाओं की अंतहीन कतार में अपनी युवावस्था का सबसे उत्पादक समय गंवा रहे हैं?
* कितने विद्यार्थियों को शिक्षा पूरी करने के बावजूद कौशल और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच इतना बड़ा अंतर मिलता है कि उनकी डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं बन पाती?
* और कितनी युवा महिलाएँ शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी सामाजिक, भौगोलिक और संस्थागत बाधाओं के कारण श्रम बाजार से बाहर रह जाती हैं?
यही कारण है कि भारत के युवा संकट को केवल ‘बेरोजगारी दर’ में कैद करना गलत होगा। ILO और अन्य अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने भी संकेत किया है कि रोजगार की मात्रा के साथ-साथ रोजगार की गुणवत्ता, कौशल और श्रम बाजार में संक्रमण युवा पीढ़ी के लिए केंद्रीय चुनौती हैं। यानी देश को केवल नौकरी के आंकड़े नहीं चाहिए; उसे ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें शिक्षा से रोजगार और रोजगार से सम्मानजनक जीवन की यात्रा संभव हो।
जब परीक्षा की ईमानदारी टूटती है, तब केवल प्रश्नपत्र नहीं टूटता—युवा का विश्वास टूटता है
भारतीय मध्यवर्गीय परिवार के लिए प्रतियोगी परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती। वह वर्षों की मेहनत, माता-पिता की बचत, बच्चों के सपनों और सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी सीढ़ियों में से एक होती है।
इसलिए जब प्रश्नपत्र लीक होता है, परीक्षा-प्रणाली में गड़बड़ी सामने आती है या परिणाम और पुनर्मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएँ तकनीकी अथवा प्रशासनिक विवादों में फँसती हैं, तो उसका प्रभाव परीक्षा-कक्ष से कहीं आगे जाता है। वह राज्य और नागरिक के बीच विश्वास को प्रभावित करता है।
NEET-UG 2026 का घटनाक्रम इसी कारण गंभीर है। 3 मई 2026 को आयोजित परीक्षा से संबंधित कथित पेपर-लीक और अनियमितताओं के आरोपों के बाद शिक्षा मंत्रालय की शिकायत पर 12 मई को CBI ने मामला दर्ज किया। जाँच के दौरान कई आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और केंद्रीय एजेंसी ने प्रश्नपत्र तक पहुँच रखने वाले व्यक्तियों तथा कथित मध्यस्थों की भूमिका की जाँच की।
इसके बाद 25 जुलाई 2026 को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया। उनका इस्तीफा उस समय आया जब NEET-UG विवाद को लेकर छात्र आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुका था।
यहाँ एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सिद्धांत सामने आता है—मंत्री का इस्तीफा केवल किसी व्यक्ति के पद से हटने की घटना नहीं होना चाहिए। यह संस्थागत जवाबदेही की अवधारणा को मजबूत करने वाला कदम तभी बनेगा जब उसके बाद परीक्षा-सुधार, प्रशासनिक जिम्मेदारी, दोषियों की निष्पक्ष जाँच और भविष्य की सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित हो। वरना हर संकट में एक चेहरा बदल जाएगा और व्यवस्था जस की तस बनी रहेगी।
युवा सड़क पर क्यों उतरता है?
सत्ता के लिए हर छात्र आंदोलन को विपक्ष की साजिश, सोशल मीडिया की उग्रता या राजनीतिक अवसरवाद के चश्मे से देखना सुविधाजनक हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र के लिए यह दृष्टि खतरनाक है। हर आंदोलन राजनीतिक नहीं होता, लेकिन हर वास्तविक आंदोलन राजनीतिक अर्थ अवश्य पैदा करता है।
किसी छात्र ने जब अपने विश्वविद्यालय की फीस, परीक्षा की पारदर्शिता, भर्ती की समयबद्धता, पेपर-लीक, छात्रवृत्ति, हॉस्टल, रोजगार या पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई, तो वह केवल अपनी निजी समस्या नहीं उठा रहा होता। वह शासन के उस तंत्र पर सवाल उठा रहा होता है जो नागरिक के अधिकार और अवसर का निर्धारण करता है। यही कारण है कि छात्र आंदोलनों को केवल ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या मान लेना लोकतांत्रिक भूल है।
हाँ, हिंसा को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, पुलिस पर हमला करना या राजनीतिक असहमति को हिंसक रूप देना स्वीकार्य नहीं हो सकता। लेकिन उसी कसौटी पर राज्य की प्रतिक्रिया भी परखी जानी चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, असहमति, सभा और राजनीतिक अभिव्यक्ति लोकतंत्र के मूल तत्व हैं; पुलिस बल का इस्तेमाल अंतिम उपाय होना चाहिए, राजनीतिक असहमति को दबाने का नियमित औजार नहीं। युवा यदि प्रश्न पूछ रहा है तो लोकतंत्र का उत्तर लाठी नहीं, नीति होना चाहिए।
राहुल गांधी और युवा राजनीति का नया अध्याय
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि भारतीय युवा राजनीति का पूरा विमर्श किसी एक नेता के इर्द-गिर्द सिमट गया है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था, सामाजिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक असमानता और युवाओं के भविष्य को विपक्ष की राजनीति के केंद्रीय प्रश्नों में बदलने का लगातार प्रयास किया है।
सितंबर 2022 से शुरू हुई भारत जोड़ो यात्रा ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को पुनर्परिभाषित किया। यात्रा का मूल उद्देश्य सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध संवाद स्थापित करना था, लेकिन उसके दौरान बेरोजगारी, महंगाई, किसानों, श्रमिकों और आर्थिक असमानता के प्रश्न भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आए। बाद की राजनीतिक यात्राओं और संसद में उनकी सक्रियता ने इस विमर्श को जारी रखा।
2024 का लोकसभा चुनाव इस संदर्भ में महत्वपूर्ण था। भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा। यह भारतीय राजनीति में एक उल्लेखनीय बदलाव था। सत्ता समाप्त नहीं हुई, लेकिन उसकी राजनीतिक संरचना अवश्य बदली। इस परिवर्तन की एक और बड़ी विशेषता थी—विपक्ष का संसद में अधिक प्रभावी होना।
राहुल गांधी ने बेरोजगारी से लेकर सामाजिक न्याय और कॉरपोरेट-सरकार संबंधों तक अनेक मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाया। उनके समर्थक इसे वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव के उभार के रूप में देखते हैं, जबकि उनके आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति मानते हैं। लोकतंत्र का काम किसी एक पक्ष की व्याख्या को अंतिम सत्य मानना नहीं, बल्कि यह देखना है कि उठाए गए प्रश्नों के उत्तर सरकार के पास हैं या नहीं। यही इस पूरे विवाद का सार है। “व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं; प्रश्न महत्वपूर्ण है।”
* यदि राहुल गांधी बेरोजगारी का प्रश्न उठा रहे हैं तो सरकार को आंकड़ों के साथ उत्तर देना चाहिए।
* यदि वे परीक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं तो सरकार को सुधारों के साथ उत्तर देना चाहिए।
* यदि वे सामाजिक प्रतिनिधित्व की बात कर रहे हैं तो सरकार को नीतिगत दस्तावेजों के साथ उत्तर देना चाहिए।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वाले से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर होता है।
जातिगत जनगणना से रोजगार तक—प्रतिनिधित्व का सवाल
भारत में नौकरी का सवाल केवल आर्थिक नहीं है। यह सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। युवा जानना चाहता है कि सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक तंत्र, सार्वजनिक उपक्रमों और नए अवसरों में उसकी हिस्सेदारी क्या है। यही कारण है कि जातिगत जनगणना की मांग को केवल जाति की राजनीति कहकर खारिज करना पर्याप्त नहीं। उसके पीछे प्रतिनिधित्व, संसाधनों तक पहुँच और रोजगार में हिस्सेदारी का प्रश्न भी मौजूद है। भारत के संविधान का वादा केवल राजनीतिक समानता नहीं है। वह सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा भी निर्धारित करता है।
अनुच्छेद 14 समानता का आश्वासन देता है, अनुच्छेद 15 भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है, अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की बात करता है और अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन के व्यापक अधिकार को संवैधानिक संरक्षण देता है। इसलिए जब कोई युवा नौकरी की मांग करता है, तो वह केवल नियुक्ति नहीं मांग रहा होता। वह संविधान में दिए गए समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन के वादे की याद दिला रहा होता है।
‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ को राजनीतिक नारा बनाना आसान है, निभाना कठिन
युवाओं को ‘डिविडेंड’ कहना अर्थशास्त्रीय भाषा में आकर्षक है, लेकिन नागरिकता की दृष्टि से अपूर्ण। युवा कोई आर्थिक संसाधन मात्र नहीं है।
* वह नागरिक है।
* वह करदाता है।
* वह मतदाता है।
* वह श्रमिक है।
* वह शोधकर्ता है।
* वह उद्यमी है।
और सबसे बढ़कर—वह लोकतंत्र का उत्तराधिकारी है। इसलिए युवा को ‘डिविडेंड’ बताकर उसकी उपलब्धियों का श्रेय लेना आसान है, लेकिन उस डिविडेंड को वास्तविक सामाजिक संपदा में बदलने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, अनुसंधान, औद्योगिक निवेश और रोजगार की दीर्घकालिक नीति चाहिए। स्टार्टअप के कुछ सफल उदाहरण पूरे रोजगार-संकट का समाधान नहीं होते।
कुछ वैश्विक विश्वविद्यालयों की उपलब्धियाँ उच्च शिक्षा की समग्र स्थिति का पर्याय नहीं बनतीं। कुछ लाख नई नौकरियाँ उस करोड़ों की आबादी के लिए पर्याप्त नहीं हो सकतीं जो हर वर्ष श्रम बाजार में प्रवेश कर रही है। इसलिए भारत के सामने आज एक बुनियादी नीति-प्रश्न है— “क्या हमारी अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से उत्पादक और सम्मानजनक नौकरियाँ पैदा कर रही है, जितनी तेजी से हमारी युवा आबादी उम्मीदें पैदा कर रही है?”
यही वास्तविक परीक्षा है।
सोशल मीडिया की रील नहीं, नीति चाहिए
युवा राजनीति में एक नया तथ्य यह भी है कि अब सत्ता और विपक्ष दोनों को डिजिटल पीढ़ी से सीधे संवाद करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं के साथ संवाद बढ़ाने का प्रयास, सोशल मीडिया पर नए प्रकार की संचार रणनीतियाँ और शिक्षा संस्थानों के कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय उपस्थिति इस बदलती राजनीतिक परिस्थिति को दर्शाती है। लेकिन यह याद रखना होगा कि Gen Z को केवल आकर्षक संचार से लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता। यह पीढ़ी डिजिटल है, लेकिन भोली नहीं।
* वह सूचना का उपभोक्ता ही नहीं, उसका सत्यापनकर्ता भी है।
* वह भाषण सुनती है तो वीडियो भी देखती है।
* वह सरकारी विज्ञप्ति पढ़ती है तो परीक्षा-परिणाम के अपने अनुभव से उसकी तुलना भी करती है।
* वह रोजगार के सरकारी दावे सुनती है तो भर्ती परीक्षा की तारीख भी पूछती है।
* वह विकास के आंकड़े देखती है तो अपने घर की आय, फीस, कोचिंग खर्च और नौकरी की वास्तविकता से उन्हें मिलाती है।
इसीलिए आज की युवा राजनीति में “संचार से ज्यादा विश्वसनीयता महत्वपूर्ण है।”
RSS और Gen Z: संवाद का प्रश्न
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा युवा पीढ़ी से संवाद बढ़ाने की पहल इस बात का संकेत है कि भारतीय राजनीति और सामाजिक संगठन अब नई पीढ़ी की बदलती मनोवृत्ति को गंभीरता से समझना चाहते हैं। संघ के शताब्दी वर्ष में संवाद और सामाजिक पहुँच पर उसका जोर भी दिखाई देता है। लेकिन संवाद की सफलता केवल कार्यक्रमों की संख्या से नहीं तय होती। युवा यह पूछेगा—
* आप रोजगार पर क्या कहते हैं?
* शिक्षा की स्वायत्तता पर क्या कहते हैं?
* विश्वविद्यालयों में असहमति के अधिकार पर आपका मत क्या है?
* पेपर-लीक पर आपकी जवाबदेही की अवधारणा क्या है?
* जाति और सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर आपकी नीति क्या है?
* महिला रोजगार पर आपका कार्यक्रम क्या है?
और सबसे कठिन सवाल—”क्या आप युवा को केवल अपनी विचारधारा का समर्थक बनाना चाहते हैं या उसे स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्वीकार करते हैं?”
जो संगठन इन प्रश्नों से संवाद करेगा, वही नई पीढ़ी के बीच जगह बना पाएगा।
युवा किसी एक दल की संपत्ति नहीं
यहाँ विपक्ष के लिए भी आत्ममंथन आवश्यक है। यह मान लेना कि छात्र असंतोष अपने आप किसी एक राजनीतिक दल के वोट में बदल जाएगा, वैसी ही भूल होगी जैसी सत्ता का यह मान लेना कि युवा केवल सरकारी योजनाओं से प्रसन्न हो जाएगा। Gen Z किसी एक वैचारिक खांचे में स्थायी रूप से बंद पीढ़ी नहीं है।
* यह पीढ़ी प्रश्न पूछती है।
* यह नेतृत्व को परखती है।
* यह संस्थाओं को परखती है।
और आवश्यकता पड़ने पर अपने समर्थक नेतृत्व से भी असहमत होती है, इसीलिए राहुल गांधी के लिए भी यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि युवा उनके साथ है। उन्हें यह साबित करना होगा कि उनके पास शिक्षा, रोजगार, कौशल, औद्योगीकरण, शोध, स्टार्टअप, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, परीक्षा-प्रणाली और सामाजिक न्याय के लिए व्यवहार्य वैकल्पिक कार्यक्रम है। आंदोलन से राजनीति का जन्म हो सकता है, लेकिन शासन के लिए नीति चाहिए।
छात्र आंदोलन सत्ता के लिए चेतावनी नहीं, लोकतंत्र के लिए अवसर है
आज देश भर में छात्र और युवा जिस बेचैनी को व्यक्त कर रहे हैं, उसे केवल राजनीतिक खतरे के रूप में देखना गलत होगा। यह लोकतंत्र के लिए एक अवसर भी है।
* क्योंकि जब युवा प्रश्न पूछता है, तो वह लोकतंत्र को जीवित करता है।
* जब वह परीक्षा की पारदर्शिता मांगता है, तो वह संस्थागत नैतिकता की मांग करता है।
* जब वह रोजगार मांगता है, तो वह आर्थिक न्याय की मांग करता है।
* जब वह पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता है, तो वह नागरिक स्वतंत्रता की सीमा पूछता है।
* जब वह प्रतिनिधित्व की बात करता है, तो वह संविधान के सामाजिक न्याय की आत्मा को सामने रखता है।
इसलिए छात्रों को ‘भीड़’ कह देना आसान है, लेकिन उन्हें नागरिक मानना लोकतांत्रिक दायित्व है।
अब प्रश्न मोदी बनाम राहुल का नहीं, भारत बनाम उसकी विफलताओं का है
भारतीय राजनीति में हर गंभीर सामाजिक प्रश्न अंततः किसी नेता की लोकप्रियता की परीक्षा में बदल दिया जाता है। लेकिन भारत को इससे आगे जाना होगा।
* यह प्रश्न केवल नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी का नहीं है।
* यह प्रश्न भाजपा बनाम कांग्रेस का भी नहीं है।
यह प्रश्न है—”क्या भारत अपनी युवा पीढ़ी को वह भविष्य दे पाएगा जिसकी उसे लगातार आशा दिखाई गई है?”
* क्या प्रतियोगी परीक्षाएँ ऐसी होंगी जिन पर देश का सबसे साधारण परिवार भी भरोसा कर सके?
* क्या विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान रहेंगे या ज्ञान, शोध और स्वतंत्र विचार के केंद्र बनेंगे?
* क्या सरकारें रोजगार के आंकड़ों के साथ-साथ रोजगार की गुणवत्ता पर भी जवाब देंगी?
* क्या भर्ती परीक्षाओं की समयबद्धता कानून से सुनिश्चित होगी?
* क्या पेपर-लीक को राष्ट्रीय शिक्षा-संकट के रूप में लिया जाएगा या हर बार किसी एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद मामला समाप्त मान लिया जाएगा?
* क्या पुलिस प्रदर्शनकारी छात्र को पहले नागरिक समझेगी और बाद में आरोपी?
* क्या राजनीतिक दल युवा को चुनावी भीड़ नहीं, नीति निर्माण का साझेदार बनाएंगे?
यही असली सवाल हैं।
नैतिकता का अंतिम प्रश्न
सत्ता की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा तब होती है जब उसके सामने अपने समर्थकों का नहीं, अपने आलोचकों का अधिकार खड़ा हो।
शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब किसी गरीब परिवार का छात्र उसी परीक्षा में सफलता की उम्मीद करे जिसमें बड़े कोचिंग संस्थानों से निकला उम्मीदवार बैठा हो।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब सत्ता के विरुद्ध नारे लग रहे हों और सरकार फिर भी संविधान के भीतर रहकर उनका उत्तर दे। और राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है जब कोई युवा कहे— “मुझे आपका भाषण नहीं, मेरा भविष्य चाहिए।”
आज भारत की युवा पीढ़ी संभवतः इसी वाक्य को अपने समय का राजनीतिक घोषणापत्र बना रही है, इसलिए सरकार को युवाओं से नाराज़ होने की नहीं, उनसे गंभीरता से सुनने की आवश्यकता है। विपक्ष को उनकी बेचैनी का चुनावी लाभ लेने से पहले अपने वैकल्पिक कार्यक्रम की विश्वसनीयता सिद्ध करनी होगी। छात्र संगठनों को भी आंदोलन के साथ अनुशासन, तथ्य और अहिंसा की मर्यादा कायम रखनी होगी। विश्वविद्यालयों को सत्ता की शाखा नहीं, विचार की स्वतंत्र भूमि बने रहना होगा। मीडिया को भी राजनीतिक प्रचार के बजाय छात्रों और बेरोजगार युवाओं की वास्तविक आवाज को स्थान देना होगा। क्योंकि यह पीढ़ी केवल नौकरी नहीं मांग रही।
* यह न्यायपूर्ण अवसर मांग रही है।
* यह केवल डिग्री नहीं मांग रही।
* यह विश्वसनीय शिक्षा मांग रही है।
* यह केवल परीक्षा नहीं देना चाहती।
* यह निष्पक्ष परीक्षा चाहती है।
* यह केवल सरकार नहीं देखना चाहती।
* यह जवाबदेह शासन चाहती है।
और सबसे बढ़कर, यह केवल भविष्य के भारत की तस्वीर नहीं देखना चाहती— “यह उस भविष्य में अपना हिस्सा सुनिश्चित करना चाहती है।”
नरेंद्र मोदी ने युवाओं को कभी भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहा था। आज समय उनसे और समूची राजनीतिक व्यवस्था से यह पूछ रहा है कि उस डिविडेंड का वास्तविक लाभांश किसे मिला?
* यदि युवा को रोजगार मिला, तो लाभांश उसका।
* यदि उसे विश्वसनीय शिक्षा मिली, तो लाभांश उसका।
* यदि उसे निष्पक्ष परीक्षा मिली, तो लाभांश उसका।
* यदि उसे सम्मान मिला, तो लाभांश उसका।
और यदि उसके हाथ में डिग्री हो, सामने बेरोजगारी हो, वर्षों की तैयारी के बाद पेपर लीक हो जाए और प्रश्न पूछने पर उसके सामने पुलिस की लाठी खड़ी हो जाए—तो इतिहास इसे ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ नहीं, लोकतांत्रिक विश्वास के घाटे के रूप में दर्ज करेगा।
भारत की आने वाली राजनीति की असली धुरी यही होगी। युवा किसके साथ खड़ा है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि “कौन युवा के साथ खड़ा है—उसके अधिकार, उसकी शिक्षा, उसके रोजगार, उसकी स्वतंत्रता और उसके भविष्य के लिए।” यही अगली राजनीतिक लड़ाई का वास्तविक मैदान है और यही भारत के लोकतंत्र की अगली बड़ी परीक्षा भी।
