
…..पण्डित प्रदीप शुक्ल
भारत में स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक बहस अक्सर दो झूठे ध्रुवों के बीच फँस जाती है। एक ध्रुव कहता है कि स्त्री तभी सुरक्षित है जब वह घर में रहे, चुप रहे, ढँकी रहे, और पुरुष-नियंत्रित मर्यादाओं में बँधी रहे। दूसरा ध्रुव यह भ्रम पैदा करता है कि सड़क, भीड़, आंदोलन और रात का जीवन अपने-आप असुरक्षा के पर्याय हैं। दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं। स्त्री की सुरक्षा का असली पैमाना उसकी पोशाक, उसकी चुप्पी या उसकी “संस्कारिता” नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की गुणवत्ता है जो उसके शरीर, उसकी सहमति और उसके निजी स्पेस का सम्मान करती है।
यही बात हाल के जन-आंदोलनों ने बहुत साफ़ तरीके से सामने रखी है। जब सैकड़ों-हज़ारों लड़कियाँ किसी विरोध-स्थल पर रात में मौजूद रहीं, खुलकर बोलीं, भीड़ में चलीं, आधुनिक कपड़ों में थीं, किसी धार्मिक या पारंपरिक आवरण में नहीं थीं, और फिर भी उन्होंने स्वयं कहा कि वे वहाँ अपने को कहीं अधिक सुरक्षित महसूस कर रही थीं, तो यह केवल एक भावनात्मक टिप्पणी नहीं थी। यह हमारे समाज पर एक कठोर सामाजिक परीक्षण था। सवाल यह नहीं है कि वहाँ “खतरा हो सकता था”; सवाल यह है कि इतने सारे तथाकथित “खतरे” मौजूद होने के बावजूद भी वहाँ के वातावरण ने उन्हें शोषण से क्यों बचा लिया। इसका उत्तर बहुत सरल है: क्योंकि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति स्त्री को वस्तु नहीं, नागरिक मानने की भावना से संचालित था।
बलात्कार और यौन हिंसा का प्रश्न भी इसी संदर्भ में समझना होगा। यौन हिंसा किसी “उत्तेजना” या “कपड़ों” का परिणाम नहीं होती; वह शक्ति, वर्चस्व, नियंत्रण और पितृसत्ता की राजनीति का चरम रूप होती है। जब कोई स्त्री अपनी इच्छा से, अपनी सहमति से, अपने अधिकार-बोध के साथ किसी सार्वजनिक स्थान पर होती है, तब उसे सुरक्षित महसूस कराने वाली चीज़ उसके ऊपर थोपी गई बंदिशें नहीं, बल्कि उसके आसपास की सामाजिक मर्यादा होती है। उस मर्यादा को बनाने वाले लोग वे होते हैं जो जानते हैं कि किसी के शरीर, आवाज़ और उपस्थिति पर अधिकार जमाना मर्दानगी नहीं, हिंसा है।
दुर्भाग्य यह है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में जब भी स्त्रियाँ अपनी आवाज़ ऊँची करती हैं, तब उन्हें चुप कराने के लिए पुरानी और घिसी-पिटी भाषा लौट आती है—चरित्र पर हमला, पहनावे पर टिप्पणी, “सभ्यता” के उपदेश, और फिर वही घिसा-पिटा आरोप कि ऐसी लड़कियाँ तो “उकसाती” हैं। यह भाषा स्त्री-विरोधी संस्कृति की सबसे गंदी और सबसे पुरानी चाल है। जो समाज स्त्री को उसकी असहमति, उसकी मुखरता और उसकी स्वतंत्रता के कारण अपराधी ठहराता है, वह समाज भीतर से बीमार है।
और जब यही बीमार मानसिकता राजनीति में प्रवेश करती है, तब मामला और भी गंभीर हो जाता है। किसी सार्वजनिक नेता का यह कहना कि लड़कियों को ऐसी स्वतंत्रता “पसंद” है, केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि सत्ता-समर्थित पितृसत्ता का बयान है। यह उस पुराने अधिकार-बोध का प्रदर्शन है जिसमें पुरुष स्वयं को स्त्री की सुरक्षा का निर्णायक, उसकी नैतिकता का न्यायाधीश और उसकी स्वतंत्रता का नियंत्रक मान बैठता है। ऐसी भाषा न स्त्री की गरिमा बढ़ाती है, न समाज की; यह केवल सत्ता के भीतर छिपी हुई असुरक्षा को बाहर लाती है।
इस पूरे विमर्श का एक और महत्वपूर्ण पक्ष गाली, अभद्रता और सार्वजनिक भाषा की मर्यादा से जुड़ा है। यह कहना कि गाली तनाव कम करती है, अपने-आप में गलत नहीं; मनोविज्ञान वास्तव में भावनाओं को सुरक्षित रूप से बाहर निकालने की ज़रूरत स्वीकार करता है। लेकिन समस्या वहाँ शुरू होती है जहाँ गाली समान अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता का विशेषाधिकार बन जाए। यदि राजनीति में सत्ता पक्ष के लिए गाली का अर्थ “मज़ाक” हो और विरोधी पक्ष या युवाओं के लिए वही गाली “कानूनी अपराध” या “सांस्कृतिक पतन” बन जाए, तो साफ़ है कि असल मुद्दा शालीनता नहीं, नियंत्रण है।
इसीलिए जब कोई सरकार या उसके समर्थक यह तय करने लगें कि कौन गाली दे सकता है और कौन नहीं, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। भाषा की मर्यादा सबके लिए समान होनी चाहिए। संसद में भी, सड़क पर भी, सोशल मीडिया पर भी। लेकिन समान मर्यादा का अर्थ यह नहीं कि सत्ता को आलोचना से सुरक्षा मिल जाए। यदि सार्वजनिक जीवन में किसी नेता के लिए अपशब्दों पर व्याकुलता है, तो उतनी ही संवेदनशीलता उन युवाओं, छात्राओं और नागरिकों के प्रति भी होनी चाहिए जिनका भविष्य, जिनकी परीक्षा, जिनका सम्मान और जिनकी सुरक्षा दांव पर लगी है।
आज देश की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस समाज को स्त्री-सुरक्षा की सबसे अधिक ज़रूरत है, वही समाज बार-बार स्त्रियों को ही दोषी ठहराता है। और जिस सत्ता को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए, वही कई बार व्यंग्य, धमकी, ट्रोलिंग और पुलिसी दबाव का सहारा लेती दिखती है। जब स्कूल की बच्चियों को पानी और पंखे की माँग पर डरा-धमकाया जाए, जब युवाओं के प्रदर्शन को अपराधीकरण की भाषा में देखा जाए, जब लड़कियों की मुखरता को “संस्कृति पर हमला” कहा जाए, तब समझ लेना चाहिए कि असली संकट कानून का नहीं, मानसिकता का है।
यह भी गंभीर प्रश्न है कि सार्वजनिक जीवन में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों की संख्या इतनी बड़ी क्यों है। यदि किसी रिपोर्ट के अनुसार एक बड़ी संख्या में सांसद और विधायक गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, तो यह केवल चुनावी राजनीति का प्रश्न नहीं, बल्कि संस्थागत नैतिकता का प्रश्न है। ऐसे माहौल में जब सत्ता की भाषा सख़्ती, धमकी और नैतिक उपदेश हो, तब जनता का अविश्वास और भी गहरा होता है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता सिर्फ़ मतदान से नहीं, सार्वजनिक आचरण की शुचिता से बनती है।
युवाओं ने हाल के आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण बात देश को दिखाई है: लड़कियों को सुरक्षित रहने के लिए घूँघट, बुरका या डर की नहीं, बल्कि सम्मान, बराबरी और सहमति-आधारित सामाजिक व्यवहार की ज़रूरत है। वे रात में भी सुरक्षित महसूस कर सकती हैं, बशर्ते उनके आसपास ऐसा समाज हो जो उन्हें शरीर नहीं, इंसान माने। वे आधुनिक कपड़ों में भी सुरक्षित हो सकती हैं, बशर्ते सामने वाला उनकी स्वतंत्रता को चुनौती नहीं, सामान्य मानवीय अधिकार समझे। वे ऊँची आवाज़ में भी सुरक्षित रह सकती हैं, बशर्ते सत्ता और समाज उनकी आवाज़ से डरे नहीं, उसे सुने।
इसलिए इस बहस का निष्कर्ष बहुत साफ़ है। स्त्रियों को सुरक्षित बनाने के लिए स्त्रियों पर नियंत्रण नहीं, पुरुषों पर नैतिक अनुशासन आवश्यक है। बलात्कार की संस्कृति का इलाज स्त्री की चुप्पी नहीं, पुरुष-सत्ता की जवाबदेही है। गाली की संस्कृति का समाधान गालियों पर एकतरफा चिंता नहीं, भाषा के समान मानदंड हैं। और यदि कोई सरकार सचमुच युवाओं और स्त्रियों के हित में है, तो उसे अपने समर्थकों की हिंसक मानसिकता, अपनी छवि-प्रेम की राजनीति और अपने भीतर के पितृसत्तात्मक आग्रहों से टकराना होगा।
सुरक्षित समाज वही है जिसमें स्त्रियाँ बिना डर, बिना छिपाव और बिना अपमान के अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें। अगर आंदोलन-स्थल यह कर सका, तो वह केवल विरोध का मंच नहीं, एक बेहतर समाज की अस्थायी झलक था। और यदि सत्ता उस झलक को भी अपमान, भय और ट्रोलिंग से धुंधला करने की कोशिश करती है, तो उसे याद रखना चाहिए: महिलाएँ अब डरना छोड़ रही हैं। और यह इस देश के भविष्य का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संकेत है।
“स्त्री की सुरक्षा उसके पहनावे से नहीं, समाज की मानसिकता से तय होती है; और जब लड़कियाँ भीड़ में भी सुरक्षित महसूस करने लगें, तब समझिए लोकतंत्र ने पहली बार सचमुच साँस ली है।”
