
….प्रदीप कुमार नायक
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस की आधी रात को जब तिरंगा लहराया था, तो नेहरू की आवाज़ में ‘भाग्य से हमारा मिलन हुआ है’ गूँज उठी थी। उसके बाद से हर वर्ष लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं। स्कूलों में बच्चे देशभक्ति के गीत गाते हैं। पासपोर्ट पर ‘Republic of India’ लिखा होता है। फिर भी हर कुछ वर्षों बाद एक सवाल सिर उठाता है और चुभता है कि क्या भारत वास्तव में आज़ाद है? या अंग्रेज चले गए, पर उनका तंत्र यहीं छोड़ गए?
इस प्रश्न का उत्तर उतावलेपन में ‘हाँ’ या ‘ना’ कहकर नहीं दिया जा सकता। क्योंकि आज़ादी केवल एक तारीख का नाम नहीं है। आज़ादी के कई आयाम होते हैं l जैसे कि राजनीतिक, आर्थिक और सबसे गहन आयाम होता है मानसिकता का।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत पूर्णतः संप्रभु राष्ट्र है। यहाँ की सरकार जनता चुनती है। यहाँ के कानून यहाँ की संसद बनाती है। यहाँ की सेना को आदेश दिल्ली से मिलते हैं, लंदन से नहीं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर जी-20 तक, भारत अपनी विदेश नीति स्वयं तय करता है। चंद्रयान भेजने का निर्णय हो या डिजिटल भुगतान की नीति, चाबी अब हमारे ही हाथ में है। उन्नीस सौ सैतालिस में अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल भारत से विदा हुआ। उन्नीस सौ पचास में अपना संविधान लागू हुआ। उस दिन से भारत किसी ताज के अधीन नहीं है। इस अर्थ में भारत आज़ाद है और इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं।
परंतु राजनीतिक आज़ादी के साथ ही दूसरी परीक्षा आरंभ होती है कि आत्मनिर्भरता की परीक्षा। अंग्रेजों के समय हम कच्चा माल भेजते थे और महँगा तैयार माल खरीदते थे। आज़ादी के बाद हमने कारखाने लगाए, हरित क्रांति की, विज्ञान और तकनीक को बढ़ाया। फिर भी आज हमारी अर्थव्यवस्था कई क्षेत्रों में विश्व पर निर्भर है। ऊर्जा के लिए, सेमीकंडक्टर के लिए, कई आवश्यक दवाओं के कच्चे माल के लिए। ब्रिटेन अब प्रत्यक्ष शासन नहीं करता, पर वैश्विक बाजार और बड़ी वित्तीय संस्थाओं के नियम वही तय करते हैं,जिनके पास पूँजी और तकनीक है। क्या इसे संपूर्ण आर्थिक आज़ादी कहा जा सकता है? संभवतः नहीं। यह यात्रा अभी अधूरी है और इसे हमें ही पूरा करना है।
इससे भी जटिल प्रश्न हमारे कानून और प्रशासन से जुड़ा है। आज भी हमारा बहुत-सा ढाँचा उसी साँचे में ढला है जिसे अंग्रेज अपने शासन की सुविधा के लिए बनाकर गए थे। पुलिस की कार्यशैली, कलेक्टर का रुतबा, अदालतों की लंबी प्रक्रिया, फाइलों का बोझ और बहुत कुछ जस का तस है। सिर्फ नाम बदल गए हैं। भारतीय दंड संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता आई, दंड प्रक्रिया संहिता के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता आई। पर ज़मीन पर बदलाव समय माँगता है। आज भी एक सामान्य नागरिक को लगता है कि कानून की भाषा उसकी भाषा नहीं है। न्याय पाने के लिए उसे अंग्रेज़ी सीखनी पड़ती है। वह अपनी ही अदालत में पराया महसूस करता है। जब तक कानून और न्याय आम आदमी की जुबान में नहीं उतरेंगे, तब तक आज़ादी का स्वाद अधूरा रहेगा।
सबसे गहरा घाव मानसिकता का है। लॉर्ड मैकाले ने कहा था कि हमें ऐसा वर्ग चाहिए जो रक्त और वर्ण से भारतीय हो, पर रुचि, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो। क्या हम उस मानसिक बंधन से पूरी तरह मुक्त हो पाए हैं? हम अब भी गोरे रंग को सुंदर मानते हैं। विदेशी डिग्री को अधिक महत्व देते हैं। अपनी भाषा में बोलने में कई बार संकोच करते हैं। अपने शिल्प, अपने ज्ञान, अपने त्योहारों को ‘लोकल’ कहकर छोटा कर देते हैं और दूसरे की नकल को ‘ग्लोबल’ कहकर बड़ा। यह सबसे खतरनाक कब्ज़ा है l क्योंकि यह बंदूक से नहीं होता। यह धीरे-धीरे सोच में उतरता है। और जब सोच पराधीन हो जाए, तो झंडे और नारों से आज़ादी सिद्ध नहीं होती।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि कुछ हुआ ही नहीं। बहुत कुछ हुआ है। हमने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम बनाया। हमने UPI जैसा डिजिटल मॉडल दुनिया को दिया। हमने संविधान में बाईस भाषाओं को स्थान दिया। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को बल मिला। स्टार्टअप से लेकर खेल तक, हर क्षेत्र में नए भारत की आहट सुनाई दे रही है। गाँव का युवा अब कहता है कि मैं भी दुनिया बदलूँगा। यह आत्मविश्वास पराधीन मन में नहीं पनपता।
फिर भी प्रश्न शेष रह जाता है। वास्तविक आज़ादी तब होगी जब एक किसान बिना बिचौलिए के अपना पक्ष अधिकारी के समक्ष रख सके। जब एक मज़दूर को अपना अधिकार माँगने के लिए सड़क पर न उतरना पड़े। जब हमारी शिक्षा हमें जड़ों से जोड़े, जड़ों से काटे नहीं। जब हम खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने और सोचने में पहले अपने देश, अपनी मिट्टी को प्राथमिकता दें।
भारत अब ब्रिटेन के अधीन नहीं है। यह तथ्य है। परंतु आज़ादी एक बार प्राप्त कर लेने वाली वस्तु नहीं है। इसे प्रतिदिन अर्जित करना पड़ता है उसे हर नीति से, हर निर्णय से, हर कक्षा से, हर घर से प्राप्त करना पड़ता हैं l
नेहरू ने कहा था कि यह प्रतिज्ञा का क्षण है। वह प्रतिज्ञा अभी अधूरी है। उसका एक भाग पूरा हुआ है, शेष भाग हमें पूरा करना है।
अतः बेहतर प्रश्न यह नहीं है कि ‘क्या हम आज़ाद हैं’। बेहतर प्रश्न यह है कि ‘आज़ादी को अधिक गहन, अधिक व्यापक और अधिक जमीनी बनाने के लिए हम आज क्या कर रहे हैं’।
क्योंकि राष्ट्र केवल सीमा से नहीं बनता। राष्ट्र सोच से बनता है। और जिस दिन हमारी सोच पूर्णतः स्वदेशी होगी, उसी दिन हम गर्व से कह सकेंगे कि भारत सचमुच आज़ाद है।
