
….पण्डित प्रदीप शुक्ल
“पत्रकार कल्याण केवल सुविधा का प्रश्न नहीं, लोकतांत्रिक गणराज्य की संस्थागत मजबूती का भी प्रश्न है”
लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान, संसद, न्यायपालिका और चुनावों से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात से भी तय होती है कि सत्ता और समाज के बीच संवाद स्थापित करने वाला पत्रकार कितना स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी रहा है। यदि पत्रकार स्वयं असुरक्षित होगा, स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होगा, आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा होगा और अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय भय के वातावरण में काम करेगा, तो लोकतंत्र की सूचना-व्यवस्था भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगेगी।
इसी व्यापक संदर्भ में काशी के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश के स्टाम्प एवं न्यायालय शुल्क मंत्री रविंद्र जायसवाल के माध्यम से मुख्यमंत्री को पत्रकारों की स्वास्थ्य सुरक्षा, आयुष्मान योजना, पेंशन, आवास और पत्रकार सुरक्षा तंत्र से संबंधित विस्तृत मांगपत्र सौंपा जाना केवल स्थानीय घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस का विषय है। इस अवसर पर पूर्व एमएलसी चेतनारायण सिंह तथा पूर्व विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह की उपस्थिति ने भी इस पहल को व्यापक सार्वजनिक महत्व प्रदान किया।
पत्रकार कल्याण नहीं, लोकतंत्र की संस्थागत आवश्यकता
पत्रकारों के लिए आयुष्मान भारत योजना का प्रभावी विस्तार, विशेष स्वास्थ्य सुरक्षा कार्ड, वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मानजनक पेंशन, पत्रकार आवास योजना तथा कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांगें किसी विशेष वर्ग को विशेषाधिकार देने की मांग नहीं हैं। ये उस पेशे की न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी अपेक्षाएँ हैं, जो लोकतंत्र में जनमत निर्माण, सत्ता की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम माना जाता है।
विडंबना यह है कि जो पत्रकार समाज के स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार, अपराध, आपदा और प्रशासनिक विफलताओं पर लगातार रिपोर्टिंग करते हैं, वही बड़ी संख्या में स्वयं स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा और वृद्धावस्था संरक्षण जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहते हैं।
पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता
देश के विभिन्न राज्यों में पत्रकारों पर हमले, धमकियां, फर्जी मुकदमे, दबाव, डिजिटल उत्पीड़न और स्थानीय स्तर पर हिंसा की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी पत्रकारों की सुरक्षा को लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण सूचक माना है।
भारतीय संविधान का “अनुच्छेद 19(1)(a)” प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यद्यपि संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का पृथक उल्लेख नहीं है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी संवैधानिक अधिकार का अभिन्न अंग है। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा केवल किसी पेशेवर वर्ग की सुरक्षा नहीं, बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार और लोकतांत्रिक पारदर्शिता की भी सुरक्षा है।
ऐसे में पत्रकार सुरक्षा तंत्र अथवा पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना समय की मांग प्रतीत होती है।
स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा : उपेक्षित आयाम
भारत में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। स्थायी नियुक्तियों की जगह अनुबंध आधारित रोजगार, डिजिटल मीडिया का विस्तार, फ्रीलांस पत्रकारिता और स्थानीय संवाददाताओं की बढ़ती संख्या ने पत्रकारों के सामाजिक सुरक्षा ढांचे को और अधिक अस्थिर बना दिया है।
हजारों पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें न संस्थागत स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध है, न नियमित भविष्य निधि, न पेंशन और न ही आकस्मिक दुर्घटनाओं की पर्याप्त सुरक्षा। महामारी के दौरान यह संकट विशेष रूप से उजागर हुआ था, जब अनेक पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग करते रहे।
यदि चिकित्सक, सैनिक, पुलिसकर्मी और अन्य सार्वजनिक दायित्व निभाने वाले वर्गों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्थाएँ विकसित की जा सकती हैं, तो लोकतंत्र के सूचना-प्रहरी पत्रकारों के लिए भी एक समग्र सामाजिक सुरक्षा नीति पर विचार किया जाना चाहिए।
‘एक देश–एक पत्रकार पहचान’ : विचार योग्य प्रस्ताव
ज्ञापन में उठाया गया “एक देश–एक पत्रकार पहचान” का प्रस्ताव भी विचारणीय है। वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न राज्यों, संस्थानों और विभागों द्वारा अलग-अलग मान्यता प्रणालियाँ संचालित होती हैं, जिससे अनेक स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल पत्रकार और छोटे मीडिया संस्थानों से जुड़े संवाददाता संस्थागत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।
निस्संदेह, ऐसी किसी व्यवस्था को लागू करते समय प्रेस की स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता, पारदर्शी मानदंड तथा राजनीतिक हस्तक्षेप से पूर्ण दूरी सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा। यदि संतुलित ढंग से इस विषय पर राष्ट्रीय नीति बनाई जाती है, तो इससे पत्रकारों की पहचान, सुरक्षा और कल्याण संबंधी व्यवस्थाओं को अधिक सुव्यवस्थित किया जा सकता है।
पत्रकारिता की विरासत का संरक्षण भी आवश्यक
ज्ञापन में पत्रकारिता की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। काशी केवल धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी ही नहीं, बल्कि हिंदी पत्रकारिता, स्वतंत्रता आंदोलन और वैचारिक विमर्श की भी एक महत्वपूर्ण भूमि रही है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर अनेक स्वतंत्रता सेनानी पत्रकारों तक की विरासत इस नगर से जुड़ी है।
ऐसी धरोहरों का संरक्षण केवल इतिहास का सम्मान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्मृति का संरक्षण भी है।
सरकार की सकारात्मक प्रतिक्रिया : अब क्रियान्वयन की चुनौती
मुख्यमंत्री द्वारा स्वास्थ्य सुरक्षा और पत्रकार कल्याण से जुड़े विषयों पर सकारात्मक कार्रवाई का आश्वासन तथा मंत्री रविंद्र जायसवाल द्वारा पत्रकारों की भूमिका को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए इन मांगों को गंभीरता से लेने की बात स्वागतयोग्य है। किंतु लोकतंत्र में आश्वासन और क्रियान्वयन के बीच की दूरी ही किसी सरकार की वास्तविक प्रतिबद्धता का पैमाना बनती है।
यदि इन प्रस्तावों पर समयबद्ध नीति, वित्तीय प्रावधान और संस्थागत ढांचा विकसित किया जाता है, तो यह केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
पत्रकारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक संरक्षण को केवल कल्याणकारी योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की गुणवत्ता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के सूचना-अधिकार से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा प्रश्न है।
जो समाज अपने पत्रकारों को सुरक्षित नहीं रख पाता, वह अंततः अपने लोकतंत्र की निगरानी करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्था को कमजोर कर देता है।
“कलम तभी निर्भीक रहेगी, जब उसे केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा, स्वास्थ्य का भरोसा और सम्मानजनक सामाजिक संरक्षण भी मिलेगा। लोकतंत्र की रक्षा केवल संसद में नहीं होती—वह उन पत्रकारों की सुरक्षा से भी होती है, जो हर दिन जनता और सत्ता के बीच सच का पुल बनकर खड़े रहते हैं।”
