राष्ट्रीय पत्रकार परिषद एवं सुरक्षा संघ ने कहा—”लोकतंत्र में निर्भीक पत्रकारिता की रक्षा के लिए कानूनी सुरक्षा अनिवार्य”
नई दिल्ली। देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्र कार्य-परिस्थितियों और सम्मानजनक पेशेवर अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ तेज होती दिखाई दे रही है। इसी क्रम में राष्ट्रीय पत्रकार परिषद एवं सुरक्षा संघ ने पत्रकारों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़ी तीन प्रमुख मांगों को लेकर व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की घोषणा की है।
संगठन के केंद्रीय नेतृत्व ने कहा कि लोकतंत्र में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण आधार है। यदि समाचार संकलन और जनहित के मुद्दों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार स्वयं असुरक्षित महसूस करेंगे, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार पर पड़ेगा।
संगठन के अनुसार उसका अभियान मुख्य रूप से तीन प्रमुख मांगों पर केंद्रित है।पहली मांग देशव्यापी पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की है। संगठन का कहना है कि समाचार संकलन के दौरान पत्रकारों पर बढ़ते हमले, उत्पीड़न और दबाव की घटनाओं को देखते हुए ऐसा व्यापक विधिक ढांचा बनाया जाना चाहिए, जो पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और उनके पेशेवर दायित्वों के निर्वहन में आने वाली बाधाओं को प्रभावी ढंग से दूर कर सके।
दूसरी मांग यह है कि समाचार कवरेज के दौरान पत्रकारों को धमकी देने, कार्य में बाधा डालने अथवा कथित रूप से झूठे मुकदमों में फंसाने के मामलों में कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। संगठन ने कहा कि न्यायालयों द्वारा समय-समय पर पत्रकारों की स्वतंत्र कार्य-परिस्थितियों के संबंध में व्यक्त सिद्धांतों की भावना के अनुरूप प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। संगठन ने यह भी मांग रखी कि ऐसे मामलों में दोषियों के विरुद्ध त्वरित दंडात्मक कार्रवाई के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाए जाएं। (यह संगठन की मांग है; वर्तमान कानून में ऐसा सार्वभौमिक प्रावधान स्वतः लागू नहीं है।)
तीसरी मांग पत्रकारों के मानदेय और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है। संगठन का कहना है कि विशेषकर छोटे और मध्यम समाचार संस्थानों से जुड़े अनेक पत्रकार असंगठित परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में उनके पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा और पेशेवर अधिकारों को लेकर स्पष्ट नीति बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि पत्रकारिता आर्थिक असुरक्षा का नहीं बल्कि सार्वजनिक सेवा का सशक्त माध्यम बन सके।
संगठन के केंद्रीय प्रमुख ने कहा कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक दल या भीड़-आधारित विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपनी मांगें सरकार तथा संबंधित संस्थाओं के समक्ष रखेगा।
उन्होंने कहा, “हम सड़क पर भीड़ जुटाने की राजनीति नहीं करेंगे। हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी कलम है। हम संविधान और कानून के दायरे में रहकर पत्रकारों के अधिकारों तथा उनकी सुरक्षा के लिए संघर्ष करेंगे।”
संगठन ने देशभर के पत्रकारों से आह्वान किया कि वे पेशेवर एकजुटता बनाए रखें और पत्रकारिता की स्वतंत्रता, निष्पक्षता तथा गरिमा की रक्षा के लिए संगठित प्रयास करें। संगठन का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा केवल मीडिया जगत का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती और नागरिकों के सूचना के अधिकार से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र पत्रकारिता शासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधि के शासन के बीच संतुलन बनाए रखने वाली नीतियों पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता है।
मुख्य मांगें
देशभर में प्रभावी पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किया जाए।
समाचार संकलन के दौरान पत्रकारों को धमकाने, बाधा पहुंचाने और कथित फर्जी मुकदमों के मामलों में त्वरित एवं प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
पत्रकारों के मानदेय, सामाजिक सुरक्षा और पेशेवर अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) की भावना के अनुरूप संस्थागत संरक्षण प्रदान किया जाए।
लोकतंत्र की मजबूती केवल स्वतंत्र चुनावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता से भी सुनिश्चित होती है। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और पेशेवर स्वतंत्रता का प्रश्न किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भारत की संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न है।