
…पण्डित प्रदीप शुक्ल
“विदेशी चंदा, छात्र आंदोलन और लोकतंत्र के बीच खड़े असहज सवाल”
भारतीय राजनीति में कुछ कानून ऐसे होते हैं जिनकी चर्चा संसद से अधिक सोशल मीडिया पर होती है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) उन्हीं में से एक है। जैसे ही इस कानून में संशोधन की बात होती है, देशभक्ति और देशद्रोह के प्रमाणपत्र बाँटने का दौर शुरू हो जाता है। कोई इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का कवच बताता है, तो कोई नागरिक समाज की स्वतंत्रता पर हमला। लेकिन इन दोनों अतियों के बीच कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनसे सत्ता भी असहज होती है और विपक्ष भी।
सबसे पहले एक तथ्य स्पष्ट कर देना आवश्यक है। FCRA कोई नया कानून नहीं है। विदेशी धन के नियमन की व्यवस्था 1976 से चली आ रही है। वर्तमान कानून 2010 में बना, 2020 में इसमें बड़े संशोधन हुए और 2026 में सरकार एक और संशोधन लेकर आई है। इसका घोषित उद्देश्य विदेशी अंशदान के प्रवाह, उपयोग और उससे निर्मित परिसंपत्तियों पर निगरानी को और प्रभावी बनाना है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए, जिसके लिए अनुमति दी गई है। सिद्धांततः इससे असहमति नहीं हो सकती। लेकिन लोकतंत्र में प्रश्न केवल उद्देश्य का नहीं, प्रक्रिया का भी होता है।
यदि सरकार कहती है कि विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग हो रहा है, तो क्या उसके पास इसका सार्वजनिक और परिमाणात्मक विवरण है? कितने मामलों में धन का दुरुपयोग सिद्ध हुआ? कितनी संस्थाओं पर कार्रवाई हुई? कितनी कार्रवाइयाँ न्यायिक समीक्षा में टिक सकीं? कितने मामलों में लाइसेंस रद्द करने के आदेश बाद में निरस्त हुए? संसद को इन प्रश्नों के उत्तर मिलना चाहिए, क्योंकि कानून तथ्यों पर बनते हैं, आशंकाओं पर नहीं।
इसी प्रकार यह भी उतना ही आवश्यक है कि FCRA की आलोचना करने वाले संगठन भी स्पष्ट करें कि वे किस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं। क्या उन्हें विदेशी धन के ऑडिट से आपत्ति है? क्या उन्हें पारदर्शिता से समस्या है? या उनका विरोध उन प्रावधानों से है जो प्रशासनिक विवेकाधिकार को अत्यधिक व्यापक बना देते हैं? यदि बहस कानून की धाराओं पर नहीं होगी, तो वह केवल राजनीतिक नारों तक सीमित रह जाएगी।
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन वास्तव में FCRA संशोधन के विरोध में प्रायोजित था। अभी तक इस दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक आधिकारिक जांच, न्यायिक निष्कर्ष या प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना न पत्रकारिता है और न ही लोकतांत्रिक ईमानदारी। यदि सरकार के पास ऐसे प्रमाण हैं, तो उन्हें संसद और देश के सामने रखा जाना चाहिए। यदि प्रमाण नहीं हैं, तो हर छात्र आंदोलन को विदेशी षड्यंत्र बताना उन लाखों युवाओं के वास्तविक प्रश्नों का अपमान होगा जो परीक्षा, भर्ती और रोजगार को लेकर सड़क पर उतरते हैं।
यहीं यह बहस और गंभीर हो जाती है। भारत में पिछले वर्षों में अनेक भर्ती परीक्षाएँ विवादों में रहीं। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, नियुक्तियों में देरी और न्यायिक मुकदमों ने युवाओं के भीतर गहरा असंतोष पैदा किया है। ऐसे वातावरण में यदि छात्र आंदोलन होता है, तो उसकी पहली व्याख्या प्रशासनिक विफलता होनी चाहिए, न कि विदेशी साज़िश। विदेशी हस्तक्षेप की संभावना यदि कहीं हो, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए; लेकिन बिना प्रमाण के हर असहमति को विदेशी फंडिंग से जोड़ देना लोकतांत्रिक विमर्श को संदेह का बंदी बना देता है।
FCRA की सबसे बड़ी चुनौती यहीं है। एक ओर राज्य को यह अधिकार है कि वह विदेशी धन के स्रोत, उपयोग और उद्देश्य पर कड़ी निगरानी रखे। दूसरी ओर संविधान नागरिकों को संगठन बनाने, सामाजिक कार्य करने और वैधानिक दायरे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी संरक्षण देता है। यदि कानून संतुलन खो देगा, तो या तो राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर होगी या नागरिक स्वतंत्रता। दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
सवाल केवल इतना नहीं है कि विदेशी धन कहाँ से आया। सवाल यह भी है कि क्या सरकारी निर्णयों में पारदर्शिता समान रूप से लागू होती है? क्या FCRA के अंतर्गत कार्रवाई के मानदंड सार्वजनिक, पूर्वनिर्धारित और न्यायिक समीक्षा के योग्य हैं? क्या सभी संगठनों पर समान कसौटी लागू होती है? या चयनात्मकता की आशंका बनी रहती है? लोकतंत्र की विश्वसनीयता इसी निष्पक्षता पर निर्भर करती है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह विषय कम महत्वपूर्ण नहीं है। सरकार इस संशोधन को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बताती है। विपक्ष इसे नागरिक समाज के लिए चुनौती मानता है। लेकिन संसद का दायित्व दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना है। संसद का काम केवल कानून पारित करना नहीं, बल्कि कानून को वैध नैतिक आधार देना भी है। यदि गंभीर विधेयक पर्याप्त बहस के बिना पारित होते हैं, तो उनकी वैधानिकता बनी रहती है, पर उनकी लोकतांत्रिक स्वीकृति कमजोर पड़ जाती है।
एक और प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सरकार वास्तव में विदेशी प्रभाव को लेकर इतनी गंभीर है, तो क्या राजनीतिक दलों की फंडिंग, चुनावी वित्तपोषण, कॉरपोरेट दान और सार्वजनिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर भी वही कठोरता दिखाई जाएगी? लोकतंत्र में पारदर्शिता चयनात्मक नहीं हो सकती। यदि निगरानी केवल नागरिक समाज पर हो और राजनीतिक व्यवस्था स्वयं अपारदर्शी बनी रहे, तो जनता के मन में स्वाभाविक संदेह पैदा होगा।
FCRA पर बहस दरअसल भारत के लोकतांत्रिक चरित्र की बहस है। क्या हम ऐसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं जहाँ हर असहमति पर विदेशी षड्यंत्र का लेबल लगा दिया जाए? या ऐसा लोकतंत्र जहाँ विदेशी हस्तक्षेप पर कठोर निगरानी भी हो और वैध सामाजिक गतिविधियों की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे? यही वह संतुलन है जिसे संविधान “विधि के शासन” के माध्यम से स्थापित करना चाहता है।
आज आवश्यकता उत्तेजक नारों की नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों की है। यदि विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग हुआ है, तो दोषियों पर कठोरतम कार्रवाई हो। यदि निर्दोष संस्थाएँ केवल वैचारिक असहमति के कारण निशाने पर हैं, तो उन्हें भी न्याय मिले। कानून की सबसे बड़ी शक्ति उसका निष्पक्ष होना है, और लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह कि वह अपने आलोचकों को भी कानून के दायरे में सुरक्षित रखता है।
FCRA पर अंतिम निर्णय संसद करेगी। लेकिन इतिहास यह तय करेगा कि वह निर्णय भय के वातावरण में लिया गया था या तथ्यों, बहस और संवैधानिक विवेक के आधार पर।
“राष्ट्र की सुरक्षा और लोकतंत्र की स्वतंत्रता—दोनों साथ रह सकते हैं; बशर्ते कानून का आधार प्रमाण हो, प्रचार नहीं; और जवाबदेही का आधार संविधान हो, संदेह नहीं।”
