“जब छात्रों का भविष्य राजनीतिक हथियार बन जाए, तब लोकतंत्र हारने लगता है”
….पण्डित प्रदीप शुक्ल
भारतीय राजनीति में एक विचित्र परंपरा विकसित हो चुकी है। किसी छात्र आंदोलन के मूल कारणों पर चर्चा कम होती है, लेकिन यह बहस अधिक चलती है कि कौन-सा नेता वहाँ पहुँचा और कौन नहीं पहुँचा। कैमरे नेता को खोजते हैं, जबकि छात्र अपने भविष्य को। टीवी स्टूडियो चेहरों की गिनती करते हैं, जबकि लाखों अभ्यर्थी अपनी उम्र, अपनी तैयारी और अपने सपनों की गिनती करते रहते हैं। आज यही स्थिति झारखंड के छात्र आंदोलन को लेकर दिखाई दे रही है।

देश के अनेक राजनीतिक समर्थक, सोशल मीडिया अभियान और कुछ पत्रकार लगातार यह प्रश्न उठा रहे हैं कि राहुल गांधी रांची क्यों नहीं गए। वही प्रश्न पहले जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर भी पूछा गया था। लेकिन क्या यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रश्न है? क्या भारत के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि विपक्ष का नेता किस मंच पर पहुँचा और किस मंच पर नहीं? यह बहस जितनी ऊँची दिखाई देती है, उतनी ही खोखली भी है।
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को लेकर छात्रों का असंतोष कई दिनों से जारी है। युवा सड़कों पर हैं, आंदोलन कर रहे हैं, पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। यह केवल झारखंड का संकट नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और अनेक राज्यों में भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, परिणामों में देरी और नियुक्तियों की अनिश्चितता ने करोड़ों युवाओं के मन में व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया है। यही असली राष्ट्रीय संकट है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि राष्ट्रीय बहस का केंद्र छात्र नहीं, राहुल गांधी बन गए हैं।
यह प्रश्न पूछा जा रहा है कि राहुल रांची क्यों नहीं गए। लेकिन उतनी तीव्रता से यह प्रश्न नहीं पूछा जा रहा कि झारखंड के छात्रों को बार-बार सड़क पर उतरना ही क्यों पड़ता है? भर्ती परीक्षाएँ विवादों में क्यों घिरती हैं? नियुक्तियाँ वर्षों तक लंबित क्यों रहती हैं? युवाओं को न्याय के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ता है? यह चयनात्मक राजनीति केवल एक दल की नहीं है।
जब दिल्ली में छात्रों का आंदोलन हुआ, तब विपक्ष सक्रिय दिखाई दिया। जब झारखंड में आंदोलन हुआ, तब भाजपा ने कांग्रेस से जवाब माँगा। दोनों ही स्थितियों में छात्रों की पीड़ा राजनीतिक अवसर में बदलती दिखाई दी। सत्ता बदलती है, विपक्ष बदलता है, लेकिन छात्र की नियति नहीं बदलती। यही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा नैतिक संकट है।
राहुल गांधी जाएँ या न जाएँ, यह उनका राजनीतिक निर्णय है। लोकतंत्र में किसी विपक्षी नेता पर यह संवैधानिक बाध्यता नहीं है कि वह हर आंदोलन स्थल पर स्वयं उपस्थित हो। उसी प्रकार किसी सत्तारूढ़ दल को भी यह अधिकार नहीं है कि वह विपक्ष की अनुपस्थिति को अपनी जवाबदेही का विकल्प बना ले। यदि झारखंड में कांग्रेस समर्थित सरकार है, तो उससे जवाब माँगना भाजपा का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन यदि दिल्ली में केंद्र सरकार है, तो वहाँ जवाब माँगना कांग्रेस का अधिकार है। लोकतंत्र में यही संतुलन है।
समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक दल अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग नैतिकता अपनाने लगते हैं। सत्ता में रहते हुए हर दल प्रशासनिक विवशताओं की बात करता है और विपक्ष में रहते हुए संवैधानिक मूल्यों की। यही दोहरा चरित्र जनता के विश्वास को सबसे अधिक चोट पहुँचाता है।
आज आवश्यकता राहुल गांधी के यात्रा कार्यक्रम का विश्लेषण करने की नहीं, बल्कि भारत की परीक्षा और भर्ती व्यवस्था का राष्ट्रीय ऑडिट करने की है।
* देश में पेपर लीक की घटनाएँ लगातार सामने आती हैं।
* भर्ती परीक्षाएँ वर्षों तक अदालतों में उलझी रहती हैं।
* लाखों रिक्त पद खाली पड़े रहते हैं।
* आयु सीमा पार करने का भय युवाओं को मानसिक तनाव में धकेल देता है।
* कोचिंग उद्योग हजारों करोड़ रुपये का कारोबार बन चुका है।
* परिवार अपनी जमा-पूँजी बच्चों की तैयारी पर खर्च कर देते हैं।
और अंत में यदि परीक्षा ही संदेह के घेरे में आ जाए तो सबसे बड़ा नुकसान केवल एक उम्मीदवार का नहीं होता; संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समान अवसर और समानता के सिद्धांत का होता है।
यही कारण है कि छात्र आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मानना एक गंभीर भूल होगी। यह प्रशासनिक पारदर्शिता, संवैधानिक समानता और लोकतांत्रिक विश्वास का प्रश्न है।
दुर्भाग्य यह है कि आज का मीडिया भी कई बार मूल प्रश्नों से अधिक व्यक्तियों पर केंद्रित हो जाता है। पत्रकारिता का पहला दायित्व सत्ता और विपक्ष दोनों से कठिन प्रश्न पूछना है। यदि प्रश्न केवल यह रह जाए कि “फलाँ नेता कहाँ गया?”, तो पत्रकारिता राजनीतिक प्रचार का विस्तार बन जाती है।
सही प्रश्न यह है—
* कितनी परीक्षाएँ समय पर हुईं?
* कितनी नियुक्तियाँ समय पर हुईं?
* कितने पेपर लीक हुए?
* कितने दोषियों को सज़ा मिली?
* कितने छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ?
* और सबसे महत्वपूर्ण—इन घटनाओं की राजनीतिक जवाबदेही किसने स्वीकार की?
राष्ट्रहित का अर्थ किसी एक दल की जीत नहीं होता। राष्ट्रहित का अर्थ है कि किसी गरीब किसान, मजदूर, कर्मचारी या रिक्शाचालक का बेटा यदि वर्षों मेहनत करके परीक्षा देता है, तो उसका भविष्य किसी भ्रष्ट तंत्र, किसी राजनीतिक संरक्षण या किसी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट न चढ़े।
भारत आज विश्वगुरु बनने की बात करता है। पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, विकसित भारत और जनसांख्यिकीय लाभांश की चर्चा होती है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपने युवाओं का विश्वास खोकर विकसित नहीं बन सकता। युवाओं की ऊर्जा यदि रोजगार के बजाय आंदोलनों में खर्च होने लगे, तो यह केवल आर्थिक विफलता नहीं, लोकतांत्रिक चेतावनी भी है।
इसलिए बहस का केंद्र राहुल गांधी नहीं होने चाहिए। बहस का केंद्र वे लाखों छात्र होने चाहिए जिनके सपने हर बार राजनीतिक बयानबाज़ी के नीचे दब जाते हैं। लोकतंत्र में नेताओं का आना-जाना समाचार हो सकता है, लेकिन छात्रों का भविष्य राष्ट्र का प्रश्न होता है।
“जब राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यह बन जाए कि “नेता कहाँ गया?”, तब समझ लीजिए कि असली सवाल—”छात्र कहाँ जा रहा है?”—हमारी राष्ट्रीय चेतना से गायब हो चुका है।”
