लोकतंत्र की जीवंतता केवल चुनाव कराने या बहुमत के आधार पर सरकारें गठित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के गलियारों में बैठे नुमाइंदे जनता और उसके प्रतिनिधियों—विशेषकर स्वतंत्र पत्रकारों—द्वारा पूछे जाने वाले तीखे और असहज सवालों के प्रति कितने संवेदनशील और सहिष्णु हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हाल ही में घटी एक घटना ने एक बार फिर इस बुनियादी सवाल को देश के केंद्र में ला खड़ा किया है कि क्या सत्ता सवाल पूछने की लोकतांत्रिक परंपरा से असहज हो रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक प्रेस वार्ता के दौरान स्वतंत्र पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव द्वारा जलभराव और एक्सप्रेस-वे की खस्ताहालों जैसे जनहित के मुद्दों पर सवाल पूछने का प्रयास करने और उसके उपरांत उपजे विवाद ने भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति पर गहरे वैचारिक एवं संवैधानिक प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
घटना का तथ्यात्मक परिदृश्य और परस्पर विरोधी दावे
तथ्यों की कड़ियों को जोड़ें तो यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही के बीच के उस स्थायी संघर्ष को रेखांकित करता है जो आधुनिक भारतीय लोकतंत्र में लगातार गंभीर होता जा रहा है। एक तरफ स्वतंत्र पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव का यह गंभीर आरोप है कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के बाद उन्हें न केवल नजरअंदाज किया गया, बल्कि सवाल पूछने के प्रयास के कारण उन्हें घेरा गया, अभद्रता का सामना करना पड़ा, और यहाँ तक कि उनके घर पर बुलडोजर चलाने की धमकी भी दी गई। वे उत्तर प्रदेश की राजधानी में बारिश के बाद जलभराव और आधारभूत संरचनाओं की कमियों जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जवाब चाहती थीं।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह प्रेस वार्ता किसी खुली मीडिया सहभागिता या प्रश्न-ोत्तर सत्र के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के ‘सेवा संकल्प अभियान’ की सूचना साझा करने के उद्देश्य से बुलाई गई थी। उनके अनुसार, किस मंच पर सवाल लिए जाएंगे या नहीं, इसका निर्णय कार्यक्रम के मॉडरेटर द्वारा निर्धारित होता है। साथ ही, उन्होंने पत्रकार की पेशेवर साख और संस्थानिक संबद्धता पर भी सवालिया निशान लगाए, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि किसी को धमकियाँ मिल रही हैं तो उसे कानूनी सुरक्षा का सहारा लेना चाहिए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का वैचारिक ध्रुवीकरण
इस घटना पर प्रतिक्रियाओं का आना और राजनीतिक दलों का आमने-सामने होना इस बात का प्रमाण है कि मीडिया की स्वतंत्रता का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय बिंदु बन चुका है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस वाकये पर तंज कसते हुए इसे मुख्यमंत्री की प्रशासनिक कमजोरी और मैदान छोड़कर भागने की प्रवृत्ति करार दिया है। उनका यह तर्क वैचारिक रूप से इस बात पर जोर देता है कि जो सरकारें मीडिया के मंच पर पत्रकारों के सवालों का सामना नहीं कर सकतीं, वे लोकतांत्रिक जनादेश के तहत जनता के बीच अपने कामकाज का हिसाब देने में कैसे सक्षम होंगी।
इसी प्रकार, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के विभिन्न वरिष्ठ नेताओं—जैसे अजय राय और अलका लांबा—ने इस घटना को सत्ता के अहंकार और महिला पत्रकार की आवाज को दबाने का सुनियोजित प्रयास बताया है। कांग्रेस नेताओं का यह कथन कि “सवाल पूछने पर धमकी देना लोकतंत्र का अपमान है,” भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की रक्षा की अनिवार्यता को पुरजोर तरीके से रेखांकित करता है। इन राजनीतिक बयानों से यह स्पष्ट होता है कि विपक्षी दल इस प्रकरण को एक अकेली घटना के रूप में नहीं, बल्कि सत्ताधीशों द्वारा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के क्रमिक क्षरण के रूप में देख रहे हैं।
संवैधानिक मूल्य, जनहित और असहमति का स्थान
भारतीय संविधान का ढांचा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, उत्तरदायित्व और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर टिका है। स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेताओं के राजनीतिक दौर में भी वैचारिक असहमतियां और तीखे राजनीतिक विरोध हुआ करते थे, लेकिन संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक संवाद के द्वार कभी बंद नहीं किए जाते थे। आज, इसके विपरीत, यदि किसी प्रेस वार्ता को केवल ‘एकतरफ़ा सूचना प्रसारण का माध्यम’ मान लिया जाए और संवाद के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएं, तो वह प्रेस कॉन्फ्रेंस लोकतांत्रिक संवाद न होकर सरकारी विज्ञापन का मंच बनकर रह जाती है।
लोकतंत्र में मीडिया को ‘चौथा स्तंभ’ इसीलिए कहा गया है कि वह सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगाए और आम नागरिक की पीड़ा को हुक्मरानों तक पहुँचाए। यदि जलभराव, बुनियादी ढांचे की नाकामी या सामाजिक सरोकार के अन्य विषयों पर जनता के प्रतिनिधि या पत्रकार सवाल पूछते हैं, तो इसे सरकार के खिलाफ शत्रुता नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार का एक रचनात्मक अवसर माना जाना चाहिए। जब सत्ता पक्ष इन सवालों से बचने के लिए तकनीकी बहाने तलाशने लगता है—जैसे यह कहना कि ‘सवाल-जवाब का सत्र तय ही नहीं था’—तो यह जनता के मन में यह आशंका पैदा करता है कि सरकार अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है।
विश्लेषण: क्या हम एक असहिष्णु राजनीतिक संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं?
इस संपूर्ण घटनाक्रम का यदि निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि राजनीति में संवादहीनता और असहिष्णुता का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। एक तरफ जहाँ सत्ता को यह अधिकार है कि वह अपने कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करे, वहीं दूसरी तरफ एक पत्रकार का कर्तव्य है कि वह जनहित से जुड़े कठिन प्रश्न पूछे। यदि सवाल पूछने पर किसी पत्रकार को सामाजिक ट्रोलिंग, धमकियों या असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
राज्य की जिम्मेदारी केवल यह कह देना नहीं है कि पीड़ित व्यक्ति पुलिस में शिकायत दर्ज कराए, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी का यह दायित्व है कि वह हर नागरिक, विशेषकर महिला पत्रकारों और स्वतंत्र विचारकों की सुरक्षा की पूर्ण गारंटी दे। भयमुक्त वातावरण के बिना स्वतंत्र पत्रकारिता संभव नहीं है, और स्वतंत्र पत्रकारिता के बिना एक मजबूत और पारदर्शी लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती।
भविष्य की दिशा और निष्कर्ष
आज का यह दौर इस बात की मांग करता है कि सत्ता में बैठे लोग अपनी असहिष्णुता को त्यागकर आलोचना को स्वीकार करने की लोकतांत्रिक परिपक्वता दिखाएं। प्रश्नों से भागने की प्रवृत्ति या असंवैधानिक भाषा और धमकियों के सहारे असहमतियों को कुचलने का प्रयास अंततः शासन व्यवस्था की साख को ही कमजोर करता है। लोकतंत्र किसी एक दल या नेता की बपौती नहीं है, बल्कि यह हर उस नागरिक का अधिकार है जो इस देश की व्यवस्था से सवाल पूछने का नैतिक साहस रखता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जो हुकूमतें जनता और मीडिया के सवालों से मुँह मोड़ती हैं, उनका उत्तर भविष्य के गर्भ में भले ही छिपा हो, लेकिन उनका राजनीतिक अवसान तय होता है। आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर एक ऐसा स्वस्थ संवाद स्थापित करें जहाँ वैचारिक भिन्नताओं का सम्मान हो और हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहे।