पण्डित प्रदीप शुक्ल…..
मैं, घंटाघर बोल रहा हूँ — लखनऊ की तहज़ीब का पुराना पहरेदार

न वह घड़ी, जो केवल समय बताती है; न वह पत्थर, जो केवल खड़ा रह जाता है। मैं वह गवाह हूँ, जिसने इस शहर को बदलते देखा है—नवाबों की नज़ाकत से लेकर नगर निगम की व्यस्तताओं तक, ताँगों की खनक से लेकर मेट्रो की सरसराहट तक, इमामबाड़ों की खामोशी से लेकर चाट-गोलगप्पों की चहक तक। मैं चौक की तरफ़ भी देखता रहा, हज़रतगंज की तरफ़ भी, कैसरबाग की पुरानी साँसों की तरफ़ भी, और गोमती के बदलते जल-स्वरूप की तरफ़ भी। मेरा वजूद इस शहर के साथ बुना गया है, इसलिए लखनऊ की कहानी कुछ हद तक मेरी ही जुबानी समझिए।
मैंने वह लखनऊ देखा है, जहाँ शिष्टता एक आदत थी, दिखावा नहीं। जहाँ बात करने से पहले नज़रों में अदब ठहरता था और सलाम करने से पहले लहजा सँवरता था। उस ज़माने में चौक की गलियों से इत्र की लहरें उठती थीं, रबड़ी की मिठास हवा में घुलती थी, टेढ़ी-पुलिया से आती आवाज़ों में ठुमरी का रस था, और अमीनाबाद की दुकानों में केवल सौदा नहीं, शेरो-शायरी भी बिकती थी। लोग चीज़ें खरीदते थे, मगर साथ में तहज़ीब भी ले जाते थे।
नवाबों के दौर की बातें मैं अपने पत्थरों में आज भी सँजोए हूँ। हुसैनाबाद के इमामबाड़े, रूमी दरवाज़ा, छोटा इमामबाड़ा—ये केवल इमारतें नहीं थीं, ये इस शहर की रूह के बाहरी चिह्न थे। उन दिनों लखनऊ की सड़कों पर भी एक तरह का ठहराव था। ताँगे चलते थे, घोड़ों की टापों में भी एक अदब होता था। गाड़ियाँ नहीं थीं, पर रफ्तार भी बदतमीज़ नहीं थी। आदमी चलकर भी शौक़ से चलता था, जैसे हर क़दम के साथ अपनी पहचान सँभाल रहा हो।
फिर समय बदला। बहुत कुछ धीरे-धीरे बदला, और बहुत कुछ एकदम से।
मैंने देखा, चौक की तंग गलियों में जहाँ कभी खुसबूदार कबाबों की धुआँधार रौनक हुआ करती थी, वहाँ अब भी रौनक है—पर रूप बदल गया है। तवायफ़ों की महफ़िलों वाला शहर एकदम से नहीं गया, वह इतिहास की तहों में समा गया। शकील बदायूँनी की शायरी, बेगम अख़्तर की ग़ज़लें, और पुराने लखनवी मुहावरों की मिठास अब भी लोगों की ज़ुबान पर है, लेकिन उस ज़ुबान की चाल अब पहले जैसी नर्म कहाँ रही। पहले “अर्ज़ किया है” कहते हुए भी आदमी मुस्कराता था, अब कई बार “सीधा बोलिए” का रुख़ आ जाता है। ख़ैर, शहर के मिज़ाज को भी समय के साथ कुछ खुरदुरा होना ही था।
मैंने अमीनाबाद को भी देखा है—कभी किताबों, कपड़ों, जूतों, तवों, शायरी और सस्ते सौदे का एक बेमिसाल बाज़ार। वहाँ की भीड़ हमेशा से रही है, पर पहले भीड़ में भी तहज़ीब थी। दुकानदार ग्राहक को बुलाता तो ऐसे जैसे कोई शायर मिसरा पूरा कर रहा हो। अब कुछ चमक ज़्यादा है, कुछ शोर भी। पर अमीनाबाद की जान अभी मरी नहीं है। शोर के नीचे अब भी पुरानी लखनवी साँसें चलती हैं।
हज़रतगंज की कहानी और भी दिलचस्प है। मैं जब जवान था, तब हज़रतगंज में शाम उतरती थी तो वहाँ की रोशनियाँ कुछ अलग ही जलती थीं। कॉफ़ी हाउस की बहसें, किताबों की दुकानों की खामोश गंध, सिनेमा हालों की कतारें, और सड़क किनारे टहलते लोग—ये सब मिलकर एक नागरिक-संस्कृति रचते थे। आज हज़रतगंज में मॉल हैं, ब्रांड हैं, ट्रैफिक है, मोबाइल के कैमरे हैं, सेल्फ़ी की जल्दी है। मगर किसी पुराने मकान की दीवार पर टिके पुराने साए अब भी वहाँ हैं। मैं उन्हें पहचानता हूँ। शहर की याददाश्त इतनी जल्दी नहीं मिटती।
गोमती का हाल भी मैंने देखा है। कभी वह इस शहर की धड़कन थी। किनारों पर हवा ज्यादा खुली लगती थी, और पानी में शाम का रंग बहुत देर तक ठहरता था। लोग गोमती को सिर्फ़ नदी नहीं समझते थे, बल्कि जैसे अपनी सांस्कृतिक सीमा मानते थे। फिर अतिक्रमण आया, गंदगी आई, कंक्रीट आई, और नदी की सहजता पर धूल बैठने लगी। पर गोमती ने हार नहीं मानी। अब भी जब उसकी सतह पर हवा काँपती है, तो मुझे लगता है जैसे शहर अपनी पुरानी आत्मा को फिर से टटोल रहा हो।
मैंने इस शहर की गर्मियों को भी देखा है। जून की दोपहरें, जैसे तपते हुए लोहे की तरह उतरती थीं। तब लोग छतों पर सोते थे, पंखे की हवा में पसीना पोंछते थे, और शरबत, बेल का रस, ठंडाई, और आँगन की छाँव जीवन के छोटे-छोटे उत्सव बन जाते थे। फिर बारिश आती थी—सावन की पहली फुहार जब सड़क की धूल को भिगोती, तो लखनऊ की हवा में मिट्टी की जो खुशबू उठती थी, वह किसी इत्र से कम न थी। बरसात में पुराने मकानों की दीवारें और भी पुरानी लगने लगती थीं, लेकिन उसी पुरानापन में शहर की असली सुंदरता बसती है।
सर्दियों का लखनऊ तो और भी नाज़ुक होता था। कोहरे में डूबी सुबहें, रज़ाई में से झाँकते बच्चे, चाय की दुकानों पर उठती भाप, और खस्ता, निहारी, कुलचे, पायसम, रूमाली रोटी, और तरह-तरह के जायकों की पहली पुकार—ये सब किसी दास्तान का हिस्सा लगते थे। चौक की गलियों में सुबह-सुबह अगर आप चलें, तो लगता था जैसे शहर अभी-अभी नींद से उठा है और अपने बाल सँवार रहा है।
और त्योहार? अरे मियाँ, लखनऊ त्योहारों में और भी लखनऊ हो जाता है।
मुहर्रम के दिनों में यह शहर मातम की गरिमा समझता है। ताज़िये उठते हैं, सबीलें लगती हैं, शोर नहीं होता, सलीका होता है। वहीं दूसरी तरफ़ ईद की रौनक—सेवइयाँ, नए कपड़े, सलाम, गले मिलना, खुशबू, और बच्चों की हँसी—शहर को एक अलग रोशनी में नहलाती है। दीवाली आती है तो बाजार रोशन हो जाते हैं। होली में रंगों के बीच भी यह शहर अपना अदब नहीं छोड़ता। यहाँ उत्सव भी बेअदबी नहीं माँगता; वह तहज़ीब के साथ आता है। यही लखनऊ की असली पहचान है।
मैंने लोगों को भी बदलते देखा है। पहले लोग धीरे चलते थे, धीरे बोलते थे, और शायद धीरे गुस्सा भी करते थे। अब रफ़्तार बढ़ी है। बाइकें हैं, कारें हैं, ऑटो हैं, ई-रिक्शा हैं, मेट्रो है। हाँ, मेट्रो ने शहर को एक नई नस दी है। वह ज़रूर तेज़ है, सलीके से चलती है, और ऊपर से शहर को एक नई रेखा देती है। लेकिन मैं जब उसकी खिड़कियों से झाँकते चेहरों को देखता हूँ, तो कई बार लगता है कि वे चेहरों के पीछे वही पुरानी लखनऊ-सी बेचैनी, वही पुरानी जल्दबाज़ी, वही पुरानी मोहब्बत अब भी है—बस भाषा बदल गई है।
राजनीति भी मैंने देखी, अफ़सरशाही भी, शहरी विस्तार भी। कई पुरानी हवेलियाँ अब दफ्तर बन गईं, कई पुराने घर टूट गए, कई गलियाँ चौड़ी हो गईं। कैसरबाग की कुछ पुरानी शान बची है, लेकिन उसी शान पर समय की दरारें भी साफ़ दिखती हैं। जो पुराने लखनऊ को समझना चाहता है, उसे सिर्फ़ इमारतें नहीं, उनकी खामोशियाँ भी पढ़नी होंगी। क्योंकि कई बार शहर अपनी बातें अपने टूटे हुए कोनों में सबसे अच्छी तरह कहता है।
लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं—“घंटाघर, तुम्हें सबसे ज़्यादा क्या याद आता है?”
मैं कहता हूँ—मुझे वह लखनऊ याद आता है जहाँ “अच्छा” कहना भी एक अदब था। जहाँ “जी हुज़ूर” में एक पूरी संस्कृति थी। जहाँ गलियों में बच्चे क्रिकेट भी खेलते थे, कंचे भी, और शाम को घर लौटते वक्त माँ की डाँट भी किसी संगीत जैसी लगती थी। जहाँ शादी-ब्याह में केवल नाच-गाना नहीं, रिश्तों की रंगत होती थी। जहाँ पकवानों में स्वाद के साथ घर की बरकत भी होती थी। जहाँ दुकानदार उधार पर भी मुस्कराकर चीज़ दे देता था, क्योंकि भरोसा भी एक मुद्रा था।
अब कुछ चीज़ें चली गईं, कुछ ने नया रूप ले लिया, और कुछ अब भी जस की तस हैं। शेर-ओ-शायरी अब भी है, लेकिन कम नुक्कड़ पर, ज़्यादा मंचों पर। गलियों की तंग रौनक अब भी है, पर गाड़ियों के बीच दब गई है। तहज़ीब अब भी है, लेकिन उसे शोर के बीच अपनी जगह बचानी पड़ती है। और लखनऊ? लखनऊ अब भी लखनऊ है—बस आईने में समय की परछाइयाँ कुछ ज़्यादा दिखने लगी हैं।
मैं, घंटाघर, इस शहर के दिल की धड़कन सुनता रहा हूँ। मैंने देखा है कि शहर सिर्फ़ इमारतों से नहीं बनता; वह लोगों की आदतों, बोलियों, पकवानों, शोर, ख़ामोशी, मौसम, और यादों से बनता है। लखनऊ की असली खूबसूरती उसके गुम होते हुए और बचते हुए, दोनों रूपों में है। जो गया, वह भी शहर का हिस्सा था। जो है, वह भी। और जो आने वाला है, उसे भी एक दिन इस तहज़ीब में ढलना पड़ेगा।
मैं अभी भी खड़ा हूँ—घड़ी की सूइयाँ लिए, समय को देखता हुआ, पर समय से हार न मानता हुआ। मेरे सामने से शहर बहता रहता है। कभी शोर में, कभी ख़ामोशी में, कभी रौशनी में, कभी धुंध में। और मैं हर आने-जाने वाले से बस इतना कहता हूँ— “देखो मियाँ, लखनऊ को देखना हो तो सिर्फ़ उसकी सड़कें नहीं, उसकी रूह भी देखनी पड़ती है।”
