
आगरा ब्यूरो कार्यालय संवाददाता
पति ने ससुराल पक्ष पर 10 लाख रुपये मांगने, धमकी देने और पत्नी को जबरन ले जाने का लगाया आरोप
पुलिस की भूमिका पर भी उठाए सवाल, निष्पक्ष जांच और महिला के बयान की वीडियोग्राफी की मांग…
आगरा। लव मैरिज के बाद एक विवाहिता को उसके परिजनों द्वारा कथित रूप से जबरन अपने साथ ले जाने के मामले ने महिला की सुरक्षा, उसकी स्वतंत्र इच्छा और पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विवाहिता के पति ने अधिकारियों को दिए प्रार्थना-पत्र में ससुराल पक्ष पर 10 लाख रुपये मांगने, धमकी देने तथा पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ ले जाने का प्रयास करने के आरोप लगाए हैं। पति का दावा है कि उसकी पत्नी करीब तीन माह की गर्भवती है और पेट दर्द की शिकायत के चलते उसका उपचार भी चल रहा था।

आर्य समाज मंदिर में विवाह, साकेत कोर्ट में कराया पंजीकरण
शिकायत के अनुसार, गुरुग्राम में निजी नौकरी करने वाले प्रशांत की करीब तीन वर्ष पहले वृंदावन निवासी विदिति गौतम से फोन पर बातचीत शुरू हुई थी। दोनों के बीच संबंध बढ़ने के बाद उन्होंने साथ रहना शुरू किया। इसके बाद 25 मार्च 2026 को दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में विवाह किया तथा 6 अप्रैल 2026 को साकेत कोर्ट, दिल्ली में विवाह का पंजीकरण कराया। पति का कहना है कि इसके बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में रह रहे थे।

गर्भवती पत्नी को आगरा छोड़कर काम पर लौटा था पति
पति के अनुसार, पत्नी की तबीयत खराब होने और गर्भावस्था के चलते वह उसे देखभाल के लिए आगरा स्थित अपने माता-पिता के घर छोड़कर गुरुग्राम नौकरी पर लौट गया था। इसी दौरान दोनों परिवारों के बीच विवाद की स्थिति पैदा होने का आरोप लगाया गया है।

10 लाख रुपये मांगने का आरोप
प्रार्थना-पत्र में पति ने आरोप लगाया है कि 16 अप्रैल को विवाहिता के पिता संजीव कुमार गौतम, उसकी चाची और कुछ अन्य लोग उसके घर पहुंचे। आरोप है कि वहां उसके माता-पिता से 10 लाख रुपये की मांग की गई और रकम नहीं देने पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी गई।
पति का दावा है कि रकम देने से इनकार करने के बाद विवाद बढ़ा और विवाहिता को कथित रूप से जबरन अपने साथ ले जाने का प्रयास किया गया। शोर सुनकर आसपास के लोगों के पहुंचने पर स्थिति शांत हुई।
पुलिस की भूमिका को लेकर भी पति ने उठाए सवाल
शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद में उसके पिता को सीओडी चौकी, थाना सदर बाजार बुलाकर बैठाया गया और उन पर दबाव बनाया गया। पति का यह भी दावा है कि पुलिस की मौजूदगी में उसकी मां और पत्नी पर दबाव बनाकर विवाहिता को उसके परिजनों के साथ भेजने की स्थिति बनाई गई।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसी बालिग महिला की स्वतंत्र इच्छा, उसकी सुरक्षा तथा पुलिस प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आएंगे।
मथुरा पहुंचने के बाद मारपीट का आरोप
पति का आरोप है कि पत्नी को वृंदावन-मथुरा ले जाने के बाद उसका मोबाइल बंद हो गया। बाद में कथित रूप से किसी अन्य मोबाइल से पत्नी ने फोन कर बताया कि उसके साथ मारपीट की जा रही है और उसे पति के खिलाफ बातें कहने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। शिकायत में बच्चे को गिराने की बात कहकर धमकाने का भी आरोप लगाया गया है।
पति का दावा है कि जब वह मथुरा पहुंचकर पत्नी से मिलने गया तो संजीव कुमार गौतम ने उसके साथ कथित रूप से गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी देकर वहां से भगा दिया।
मानवाधिकार के नजरिए से सबसे अहम सवाल
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विवाहिता की वर्तमान इच्छा क्या है और वह स्वयं किसके साथ रहना चाहती है। यदि महिला बालिग है, तो उसकी स्वतंत्र इच्छा और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलना आवश्यक है।
साथ ही, यदि वह गर्भवती है और उपचाराधीन है तो उसके स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय जरूरतों की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि कराई जानी चाहिए। महिला पर किसी भी प्रकार का दबाव, धमकी या हिंसा हुई है या नहीं—इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
प्रशासन से पांच बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग
पति ने अधिकारियों से मांग की है कि—
विवाहिता और उसके होने वाले बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
विवाहिता का बयान स्वतंत्र एवं बिना किसी दबाव के दर्ज कराया जाए।
आवश्यकता होने पर महिला का बयान महिला पुलिस अधिकारी/मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में वीडियोग्राफी के साथ कराया जाए।
10 लाख रुपये की कथित मांग, धमकी, मारपीट और जबरन ले जाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
पुलिस की भूमिका पर लगाए गए आरोपों की भी वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराई जाए, ताकि यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय हो सके।
प्रशासन के सामने निष्पक्ष जांच की चुनौती
मामले में दोनों पक्षों के आरोपों और तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में किसी भी पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय प्रशासन के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि विवाहिता की स्वतंत्र इच्छा, सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
यदि पति के आरोप गलत हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट हो सकती है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा। निष्पक्ष जांच ही इस विवाद में सच्चाई सामने लाने और महिला के मानवाधिकारों की रक्षा करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।
