संवाददाता प्रिंस गुप्ता मंडल प्रभारी पुलिस दर्पण
भदोही। करघे पर चलती उंगलियां केवल धागों को नहीं बुनतीं, बल्कि भारत की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता की एक गौरवशाली कहानी भी रचती हैं। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर विश्व प्रसिद्ध कालीन नगरी भदोही अपने बुनकरों के अथक परिश्रम और सदियों पुरानी शिल्प परंपरा को नमन कर रही है। यही वह धरती है, जहां लाखों हाथों की मेहनत ने हस्तनिर्मित कालीनों को विश्व बाजार में अलग पहचान दिलाई है।

हर वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1905 में कोलकाता के टाउन हॉल से स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का संदेश दिया। बाद में महात्मा गांधी ने चरखा और खादी को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया। इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 से 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
भदोही का कालीन उद्योग इसी स्वदेशी भावना का जीवंत उदाहरण है। माना जाता है कि मुगल काल में फारसी शैली की कालीन बुनाई इस क्षेत्र में पहुंची, जिसे स्थानीय कारीगरों ने अपने कौशल और सृजनशीलता से नई पहचान दी। आज भदोही के हस्तनिर्मित कालीन अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों सहित दुनिया के अनेक देशों में निर्यात किए जाते हैं। उत्कृष्ट गुणवत्ता और विशिष्ट शिल्पकला के कारण भदोही के कालीनों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग भी प्राप्त है।
कालीन उद्योग भदोही की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। जिले के हजारों गांवों में लाखों बुनकर, कारीगर और श्रमिक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं। उनके हाथों से तैयार हर कालीन भारतीय कला, संस्कृति और परंपरा का जीवंत दस्तावेज बनकर दुनिया तक पहुंचता है।
हालांकि समय के साथ उद्योग कई चुनौतियों का सामना भी कर रहा है। मशीन निर्मित उत्पादों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, कुशल बुनकरों की कमी, घटती मजदूरी और नई पीढ़ी का पारंपरिक व्यवसाय से दूर होना उद्योग के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद भदोही के बुनकर अपने हुनर और समर्पण से इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर उद्योग से जुड़े लोगों ने बुनकरों के हितों की सुरक्षा, आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण, उचित मजदूरी और नए निर्यात बाजार उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
उमेश गुप्ता अध्यक्ष (एक्मा) भदोही ने कहा, “भदोही का कालीन उद्योग देश की शान है। नई तकनीक, बेहतर विपणन और बुनकरों के कौशल को बढ़ावा देकर इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।”
असलम महबूब, उपाध्यक्ष, सीईपीसी ने कहा, “बुनकर इस उद्योग की असली ताकत हैं। उनके सम्मान और आर्थिक सुरक्षा के बिना उद्योग का विकास संभव नहीं है।”
श्यामनारायण यादव, कालीन निर्यातक (पकरी भदोही ) ने कहा, “विश्व बाजार में हस्तनिर्मित कालीनों की मांग लगातार बनी हुई है। गुणवत्ता, आधुनिक डिजाइन और समय पर आपूर्ति से निर्यात में और वृद्धि हो सकती है।”
हाजी अब्दुल रब अंसारी, आरएमसी कलेक्शन, भदोही ने कहा, “करघा हमारे लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि हमारी पहचान और हमारी विरासत है। आने वाली पीढ़ी को भी इस कला से जोड़ना होगा।”
पूनम मौर्य, पूर्व ब्लॉक प्रमुख, भदोही ने कहा, “कालीन उद्योग में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। महिला बुनकरों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बेहतर अवसर देकर उन्हें और सशक्त बनाया जा सकता है।”
अमित मौर्य, युवा कालीन निर्यातक, क्रिएटिव रग्स भदोही, ने कहा, “यदि बुनकरों को उचित मजदूरी, आधुनिक सुविधाएं और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिले, तो भदोही का कालीन उद्योग फिर से नई ऊंचाइयों को छू सकता है।”
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उन लाखों मेहनतकश बुनकरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिनके हाथों से निकला हर धागा भारत की संस्कृति, स्वदेशी की भावना और आत्मनिर्भरता का संदेश दुनिया तक पहुंचाता है। भदोही के करघों की गूंज आज भी भारतीय शिल्पकला की समृद्ध विरासत को विश्व मंच पर गौरवान्वित कर रही है।
