
“राहुल गांधी बनाम अमित शाह की राजनीतिक लड़ाई के बीच असली प्रश्न यह है कि छात्रों पर बल-प्रयोग की अनुमति किसने दी, किस परिस्थिति में दी और उसकी संवैधानिक जवाबदेही कौन तय करेगा?”
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष और सत्ता के बीच तीखा राजनीतिक संघर्ष कोई असामान्य बात नहीं है। लोकतंत्र की सेहत के लिए सत्ता से प्रश्न पूछना उतना ही आवश्यक है जितना सरकार का उन प्रश्नों का उत्तर देना। लेकिन जब सवाल देश के युवाओं, छात्रों, पुलिस बल, गोली, पैलेट, लाठी और राज्य की शक्ति से जुड़ जाए, तब मामला महज राजनीतिक बयानबाजी का नहीं रह जाता। वह संविधान, विधि और राज्य की नैतिक वैधता का प्रश्न बन जाता है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से यह पूछना कि 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पैलेट या अन्य प्रक्षेपास्त्रों का इस्तेमाल किसके आदेश पर हुआ, इसी व्यापक प्रश्न का हिस्सा है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का पलटवार है कि राहुल गांधी “गलत सूचना” फैला रहे हैं, जंतर-मंतर पर गोली नहीं चली और न ही गोली चलाने का कोई आदेश था। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने उन्हें संसद में आकर चर्चा करने की चुनौती दी, जबकि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा कि सरकार गृह मंत्री के जवाब के लिए तैयार है। लेकिन अब इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घटनाक्रम की बाद की रिपोर्टों ने प्रारंभिक आधिकारिक दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
20 जुलाई की कार्रवाई के संबंध में सामने आए पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार RAF ने anti-riot guns, tear-smoke munitions और plastic-pellet rounds का इस्तेमाल किया था। एक पुलिस जनरल डायरी में दर्ज विवरण के अनुसार RAF ने दिल्ली पुलिस के एक DCP-रैंक अधिकारी के निर्देश पर दो anti-riot gun rounds और दो plastic-pellet rounds दागे। दूसरी रिपोर्टों में RAF के आंतरिक परीक्षण का भी उल्लेख है, जिसमें कई कर्मियों को pellet guns जारी किए जाने और उसके बाद उनकी तैनाती पर पुनर्विचार की बात सामने आई।
इसलिए आज बहस का स्तर यह नहीं होना चाहिए कि “राहुल गांधी सही हैं या भाजपा सही है।”
असल प्रश्न है—
* उस दिन बल प्रयोग की वास्तविक प्रकृति क्या थी?
* किस अधिकारी ने क्या आदेश दिया?
* कौन-सा हथियार इस्तेमाल हुआ?
* किस SOP के तहत हुआ?
* किस स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक पर्यवेक्षण था?
और सबसे महत्वपूर्ण—”क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध ऐसा बल संवैधानिक और विधिक कसौटियों पर खरा उतरता है?”
विरोध का अधिकार सरकार की कृपा नहीं, संविधान का संरक्षण है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं; राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन युक्तिसंगत प्रतिबंध का अर्थ यह नहीं कि असहमति को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कुचल दिया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन बनाना राज्य का दायित्व है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर विरोध का अधिकार और अन्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन आवश्यक है। यानी संवैधानिक व्यवस्था का सिद्धांत साफ है—”प्रदर्शन की अनुमति राज्य की मेहरबानी नहीं; उसके नियमन की जिम्मेदारी राज्य की है।”
सरकार को यह अधिकार है कि वह संसद, सरकारी प्रतिष्ठानों और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। उसे बैरिकेड लगाने का अधिकार है। उसे मार्ग निर्धारित करने का अधिकार है। कानून-व्यवस्था बिगड़ने पर भीड़ को नियंत्रित करने का अधिकार भी है। लेकिन इन सभी अधिकारों की सीमा संविधान तय करता है। सरकार के पास बल है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी अधिक है।
लोकतंत्र में पुलिस राज्य की शक्ति है, सत्ता की निजी सेना नहीं
पुलिस और अर्धसैनिक बल किसी दल के नहीं होते। वे संविधान और कानून के अधीन राज्य की संस्थाएँ हैं। उनका उद्देश्य सरकार की राजनीतिक आलोचना को समाप्त करना नहीं, सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है; इसलिए किसी भी बड़े प्रदर्शन में दो तस्वीरें साथ-साथ देखी जानी चाहिए।
एक तरफ प्रदर्शनकारी की जिम्मेदारी है कि वह हिंसा न करे, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति न पहुँचाए, हथियार न उठाए और पुलिस या अन्य नागरिकों पर हमला न करे।
दूसरी तरफ राज्य की जिम्मेदारी है कि वह न्यूनतम आवश्यक बल का प्रयोग करे, बल का क्रमिक और अनुपातिक उपयोग करे, घायल नागरिकों को चिकित्सा सहायता दे, और प्रत्येक गंभीर चोट या हथियार के इस्तेमाल का दस्तावेजी रिकॉर्ड रखे।
लोकतंत्र का नैतिक सिद्धांत यही है—”भीड़ कानून से ऊपर नहीं हो सकती, लेकिन पुलिस भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।”
20 जुलाई के दिल्ली प्रदर्शन की घटनाओं में पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों के घायल होने की खबरें सामने आई थीं। इसका अर्थ यह है कि घटना को एकतरफा कथा में समेटना गलत होगा। कानून तोड़ने वाले प्रदर्शनकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए और यदि पुलिस ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उस पर भी वैसी ही जांच होनी चाहिए। न्याय की कसौटी पक्ष देखकर नहीं बदल सकती।
“गोली नहीं चली” बनाम “पैलेट इस्तेमाल हुई”—शब्दों का खेल नहीं, तथ्य की जांच जरूरी
इस विवाद का सबसे चिंताजनक पक्ष राजनीतिक दावों का टकराव नहीं, बल्कि तथ्य की अस्पष्टता है। सरकारी पक्ष ने कहा कि गोली नहीं चली। लेकिन बाद में सामने आए दस्तावेजों और रिपोर्टों के अनुसार anti-riot guns और plastic-pellet rounds के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया। एक पुलिस रिकॉर्ड में RAF की कार्रवाई का ब्योरा भी सामने आया जिसमें 55 non-electrical shells, 15 electrical shells, पांच tear-smoke grenades, दो anti-riot gun rounds और दो plastic-pellet rounds का उल्लेख था।
यहाँ शब्दों की राजनीति से बचना होगा। “गोली” और “पैलेट” तकनीकी रूप से एक ही चीज़ नहीं हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए यह अंतर तब गौण हो जाता है जब प्रश्न उसके शरीर में घुसी धातु, प्लास्टिक या अन्य प्रक्षेप्य से पैदा हुई चोट का हो और यहीं राज्य को पारदर्शिता की आवश्यकता है।
* यदि हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ, तो रिकॉर्ड सामने रखिए।
* यदि anti-riot gun का इस्तेमाल हुआ, तो बताइए कि किस परिस्थिति में।
* यदि plastic pellets दागे गए, तो बताइए कि किसने आदेश दिया।
* यदि पैलेट केवल जमीन की ओर या विशेष दिशा में दागे गए, तो उसका operational justification क्या था?
* यदि किसी अधिकारी ने SOP का उल्लंघन किया, तो कार्रवाई कौन करेगा?
लोकतंत्र में विश्वास बयान से नहीं, प्रमाण सार्वजनिक करने से बनता है।
क्या अमित शाह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं? कानून इस प्रश्न को कैसे देखता है
राहुल गांधी का राजनीतिक प्रश्न है कि गृह मंत्री ने अनुमति दी या नहीं। यदि दी थी तो इस्तीफा दें; यदि नहीं दी थी और उन्हें जानकारी नहीं थी तो वे गृह मंत्री बने रहने के योग्य नहीं—यह एक राजनीतिक नैतिक तर्क है लेकिन कानूनी रूप से जिम्मेदारी निर्धारित करने की प्रक्रिया अधिक जटिल है।
हर पुलिसकर्मी की हर कार्रवाई के लिए संबंधित केंद्रीय मंत्री को व्यक्तिगत रूप से आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कमांड संरचना, प्रशासनिक नियंत्रण, लिखित आदेश, operational chain, knowledge, approval और घटना के बाद की कार्रवाई—इन सबकी जांच आवश्यक होगी; पर इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। “राजनीतिक जवाबदेही केवल उस आदेश से तय नहीं होती जिस पर मंत्री के हस्ताक्षर हों।”
लोकतांत्रिक शासन में मंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके अधीन संस्थाएँ क्या कर रही हैं, इसकी वह जवाबदेही स्वीकार करे। यदि किसी मंत्रालय या विभाग के अधीन बल द्वारा गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हुआ है, तो मंत्री का दायित्व केवल यह कहना नहीं कि “मैंने गोली चलाने का आदेश नहीं दिया।” यह भी बताना होगा कि—
* क्या उन्हें घटना की जानकारी थी?
* कब मिली?
* उन्होंने क्या तत्काल कार्रवाई की?
* क्या स्वतंत्र जांच बैठाई?
* क्या footage सुरक्षित की गई?
* क्या मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए?
* क्या संबंधित अधिकारियों को निलंबित अथवा जांच के दायरे में लिया गया?
* क्या संसद को तथ्यात्मक रिपोर्ट देने की तैयारी है?
यही ministerial accountability है। राजनीतिक जिम्मेदारी और आपराधिक जिम्मेदारी एक ही चीज नहीं हैं। इस फर्क को समझे बिना पूरा विमर्श केवल नारे में बदल जाएगा।
संसद में चर्चा से भागना या संसद को जांच का मंच बनाना?
बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी और विपक्ष से कहा है कि वे सदन में आएँ और गृह मंत्री का पूरा जवाब सुनें। सिद्धांततः यह उचित मांग है। संसद बहस का सर्वोच्च राष्ट्रीय मंच है।
विपक्ष को प्रश्न पूछने हैं तो उसे जवाब भी सुनने चाहिए। सत्ता को जवाब देना है तो उसे विपक्ष की शंकाओं से बचना नहीं चाहिए। लोकतंत्र केवल भाषण देने का अधिकार नहीं, दूसरे पक्ष को सुनने का अनुशासन भी है लेकिन संसद में चर्चा का अर्थ केवल मंत्री का भाषण नहीं होना चाहिए। यदि सरकार गंभीर है तो उसे संसद में निम्नलिखित चीजें रखने पर विचार करना चाहिए—
* 20 जुलाई की पूरी घटना का chronology;
* बल प्रयोग की आदेश-श्रृंखला;
* ड्यूटी पर तैनात बलों की संख्या;
* इस्तेमाल किए गए crowd-control उपकरणों की सूची;
* SOP और उसके पालन की स्थिति;
* पुलिस, RAF और अन्य बलों की रिपोर्ट;
* घायलों की आधिकारिक संख्या;
* चिकित्सकीय दस्तावेज;
* CCTV और body-camera footage की स्थिति;
और जहां नियमों का उल्लंघन हुआ हो, वहां जवाबदेही की कार्रवाई। तभी संसदीय बहस राजनीतिक शोर से संस्थागत जांच में बदलेगी।
पर विपक्ष के लिए भी एक कठिन सवाल है
विपक्ष को सरकार से प्रश्न पूछने का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक नैतिकता विपक्ष से भी एक न्यूनतम जिम्मेदारी मांगती है—तथ्यों की पुष्टि के बिना सबसे गंभीर आरोपों को अंतिम सत्य की तरह पेश न किया जाए।
यदि राहुल गांधी “गोली” शब्द का इस्तेमाल करते हैं जबकि वास्तविक रिकॉर्ड में anti-riot gun, plastic pellet या किसी अन्य non-lethal ammunition का तकनीकी उल्लेख है, तो भाषा में स्पष्टता आवश्यक है क्योंकि लोकतंत्र में सरकार का गलत तथ्य देना गंभीर है, लेकिन विपक्ष का गलत तथ्य देना भी उतना ही गंभीर है।
विपक्ष की विश्वसनीयता उसकी आवाज की ऊंचाई से नहीं, उसके तथ्यों की मजबूती से तय होती है। लेकिन यही कसौटी सत्ता पर और कठोरता से लागू होगी क्योंकि सत्ता के पास सूचना के स्रोत हैं, सरकारी रिकॉर्ड हैं, पुलिस संरचना है, जांच एजेंसियाँ हैं और पूरे राज्य का संस्थागत तंत्र है। इसलिए सत्य की अंतिम जिम्मेदारी भी सत्ता पर अधिक है।
झारखंड का सवाल भाजपा के लिए आईना है
बीजेपी ने राहुल गांधी से पूछा है कि यदि वे दिल्ली में छात्रों पर कथित बल-प्रयोग के खिलाफ हैं तो झारखंड में छात्रों पर कार्रवाई का विरोध क्यों नहीं करते, जबकि झारखंड में कांग्रेस राज्य सरकार का सहयोगी है। यह प्रश्न राजनीतिक रूप से असुविधाजनक अवश्य है, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से प्रासंगिक भी है।
10 अगस्त 2026 को रांची में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने विधानसभा की ओर मार्च किया। पुलिस ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश के बाद पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। इस घटना के बाद भाजपा ने 11 अगस्त को झारखंड बंद का आह्वान किया।
यहाँ बीजेपी का सवाल कांग्रेस से जायज़ है— यदि छात्रों पर बल-प्रयोग गलत है, तो झारखंड में भी गलत है लेकिन इसके साथ ही बीजेपी के लिए भी एक समान प्रश्न है— यदि छात्रों पर बल-प्रयोग गलत है, तो दिल्ली में भी गलत है। यही लोकतांत्रिक सिद्धांत की असली परीक्षा है। “क्या राजनीतिक दल छात्र की चोट देखकर यह तय करेंगे कि राज्य में सरकार किसकी है?” यदि हाँ, तो लोकतंत्र नैतिकता खो देगा।
दिल्ली में छात्र पीटे जाएँ तो विपक्ष का विरोध और झारखंड में छात्र पीटे जाएँ तो सत्ता पक्ष का बचाव—यह दोहरा मापदंड है और इसका उल्टा भी उतना ही गलत होगा।
आज आवश्यकता है कि देश एक ही कसौटी स्वीकार करे—”छात्र कहीं भी पीटे जाएँ, सत्ता चाहे किसी की भी हो, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।”
झारखंड आंदोलन को भी केवल राजनीतिक अवसरवाद बनाकर खारिज नहीं किया जा सकता
झारखंड के छात्र जिस मुद्दे पर सड़क पर हैं, वह केवल राजनीतिक टकराव नहीं है। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, वर्षों की तैयारी, परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप, परिणामों को लेकर अनिश्चितता और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी का प्रश्न इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में है। हालिया घटनाक्रम में JPSC-JSSC अभ्यर्थियों की मांगें परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़ी रही हैं।
यह देश के लिए बड़ा संकेत है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक युवा आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा का संकट नहीं रह गए हैं। यह राज्य के भर्ती तंत्र पर विश्वास के संकट का संकेत हैं। जब एक युवा तीन या चार वर्ष तैयारी करता है, परिवार से पैसे लेता है, दूसरी नौकरियाँ छोड़ता है और फिर परीक्षा की वैधता पर सवाल उठता है, तब उसके लिए यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं होती। यह उसकी जिंदगी के वर्षों की कीमत होती है।
सरकारें भूल रही हैं कि बेरोजगार युवा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील नागरिक है
भारत में सरकारी नौकरी अब भी करोड़ों परिवारों के लिए आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक है, इसीलिए भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता का सामाजिक प्रभाव बहुत व्यापक है। जब परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा घटता है, तब निम्नलिखित क्रम शुरू होता है—
* पहले युवा निराश होता है।
* फिर वह आंदोलन करता है।
* फिर वह संस्थाओं पर अविश्वास करने लगता है।
* और अंततः वह राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध मतदान या सड़क के माध्यम से प्रतिक्रिया देता है।
इसलिए छात्र आंदोलन को केवल “कानून-व्यवस्था” की फाइल में बंद करना नीति की दृष्टि से बड़ी भूल है। यह मूलतः शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
पुलिस की प्रतिष्ठा भी जवाबदेही से बचेगी, बचाव से नहीं
यह कहना भी उचित नहीं कि पुलिस हर बार दोषी है। बड़ी भीड़ में हिंसा भड़क सकती है। बैरिकेड टूट सकते हैं। पुलिस पर पत्थर चल सकते हैं। सरकारी संपत्ति को नुकसान हो सकता है। संसद या महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थानों की सुरक्षा के लिए बल प्रयोग की वास्तविक आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है।
ऐसी स्थिति में पुलिस का कर्तव्य है कि वह कार्रवाई करे लेकिन कार्रवाई और अंधाधुंध बल प्रयोग में अंतर है। पुलिस की प्रतिष्ठा इस बात से नहीं बचेगी कि हर आरोप को “फेक न्यूज़” कह दिया जाए। उसकी प्रतिष्ठा तब बचेगी जब वह कहेगी—“यह रहा हमारा रिकॉर्ड। यह रहा आदेश। यह रहा वीडियो। यह रहा SOP। यह रहा मेडिकल डेटा। और जहाँ गलती हुई है, वहाँ जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई हुई है।”
यही संस्थागत आत्मविश्वास है।
मीडिया की भूमिका: दोनों पक्षों की प्रेस विज्ञप्ति पढ़ना पत्रकारिता नहीं
इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सरकार कहे गोली नहीं चली और विपक्ष कहे गोली चली—तो पत्रकारिता का काम किसी एक बयान को सुर्खी बनाकर छोड़ देना नहीं। काम है—
* रिकॉर्ड खोजना।
* चिकित्सा दस्तावेज देखना।
* पुलिस डायरी देखना।
* CCTV खोजना।
* हथियारों की प्रकृति समझना।
* फॉरेंसिक साक्ष्यों की जांच करना।
* घायलों की संख्या का स्वतंत्र सत्यापन करना।
और फिर पाठक को बताना कि “क्या प्रमाणित है, क्या विवादित है और क्या अभी जांच के अधीन है।” यही लोकतंत्र को सूचना और प्रचार के बीच अंतर देता है।
राष्ट्रीय हित में सबसे जरूरी है—सत्य की संस्थागत जांच
इस समय केंद्र सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए सबसे जिम्मेदार रास्ता एक स्वतंत्र और विश्वसनीय तथ्य-जांच तंत्र की ओर जाना है।
* संसद में चर्चा हो, लेकिन केवल भाषण न हों।
* घटना की स्वतंत्र जांच हो।
* जिस अधिकारी ने आदेश दिया, उसकी पहचान हो।
* यदि आदेश विधिसम्मत था, तो उसका औचित्य स्पष्ट किया जाए।
* यदि SOP का उल्लंघन हुआ, तो जिम्मेदारी तय हो।
* यदि कोई प्रदर्शनकारी हिंसा का दोषी है, उस पर भी निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई हो।
* यदि कोई पुलिसकर्मी अनुचित बल-प्रयोग का दोषी है, उस पर भी समान कठोरता से कानून लागू हो।
और यदि किसी राजनीतिक नेता ने तथ्य को तोड़-मरोड़कर पेश किया है, तो उसका राजनीतिक उत्तर तथ्य से दिया जाए—प्रचार से नहीं। यही राष्ट्रहित है।
लोकतंत्र का असली प्रश्न
* इस विवाद में भाजपा राहुल गांधी पर हमला कर सकती है।
* राहुल गांधी अमित शाह का इस्तीफा मांग सकते हैं।
* कांग्रेस झारखंड का बचाव कर सकती है।
* भाजपा झारखंड का उदाहरण देकर कांग्रेस को घेर सकती है।
* संसद में नारे लग सकते हैं।
* सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकते हैं।
लेकिन इन सबके बीच एक सवाल लगातार खड़ा रहेगा—”क्या भारत में किसी छात्र को अपने भविष्य, रोजगार और निष्पक्ष परीक्षा के लिए सड़क पर उतरने के बाद राज्य की ऐसी शक्ति का सामना करना चाहिए जिससे उसके शरीर पर चोट और मन में भय पैदा हो?”
* और यदि हाँ, तो किस कानून के तहत?
* किस आदेश से?
* किस अधिकारी की जिम्मेदारी पर?
* किस न्यायिक या प्रशासनिक निगरानी में?
* यही प्रश्न लोकतंत्र की रीढ़ है।
क्योंकि संविधान ने सरकार को शक्ति इसलिए नहीं दी कि वह नागरिकों को चुप करा सके। उसे शक्ति इसलिए दी गई है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके।
“राज्य की शक्ति का मूल्यांकन इस बात से नहीं होता कि वह कितनी बड़ी भीड़ को तितर-बितर कर सकता है; उसका मूल्यांकन इससे होता है कि वह असहमति के बीच भी कानून, संयम और संविधान को कितना अक्षुण्ण रख सकता है।”
आज आवश्यकता राहुल गांधी और अमित शाह के बीच विजेता तलाशने की नहीं है। आवश्यकता उस व्यवस्था को विजयी बनाने की है जिसमें न दिल्ली का छात्र पुलिस से डरे, न झारखंड का छात्र सरकार से, और न किसी सरकार को यह भय हो कि पारदर्शी जांच उसके विरुद्ध जाएगी क्योंकि अंततः सरकारें आती-जाती हैं, पार्टियाँ बदलती हैं, नेता बदलते हैं—लेकिन “संविधान और नागरिक का अधिकार स्थायी होना चाहिए।”
“छात्रों पर चली लाठी की आवाज कुछ देर में थम जाती है, लेकिन यदि लोकतंत्र ने उनकी पुकार नहीं सुनी, तो वही आवाज अगली पीढ़ी के मतपत्र में गूंजती है।”
