एटा। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के माध्यम से संचालित महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार की जाने वाली हस्तनिर्मित राखियों के विपणन को लेकर इस वर्ष विभाग की निष्क्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है।

पिछले कई वर्षों से रक्षाबंधन के अवसर पर विकास भवन परिसर में सखी समूहों द्वारा विशेष बिक्री स्टॉल लगाए जाते रहे हैं, जहां जिले के विभिन्न विकास खंडों की महिलाओं द्वारा तैयार की गई आकर्षक एवं पर्यावरण अनुकूल राखियों की बिक्री होती थी। इससे न केवल स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को अतिरिक्त आय प्राप्त होती थी, बल्कि स्थानीय उत्पादों को भी व्यापक पहचान मिलती थी।
इस वर्ष त्योहार नजदीक आने के बावजूद अब तक ऐसी कोई तैयारी दिखाई नहीं दे रही है, जिससे महिला समूहों में निराशा का माहौल है।जानकारों के अनुसार, तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी नागेंद्र नारायण मिश्र तथा तत्कालीन जिला मिशन प्रबंधक (डीसी-एनआरएलएम) प्रतिमा निमेष के कार्यकाल में रक्षाबंधन से पूर्व विशेष कार्ययोजना तैयार की जाती थी। विकास भवन में सखी समूहों के स्टॉल लगाए जाते थे तथा विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी स्थानीय महिला समूहों द्वारा निर्मित राखियां खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता था।प्रशासनिक सहयोग मिलने से महिला समूहों को अच्छा आर्थिक लाभ प्राप्त होता था और उनके उत्पादों का व्यापक प्रचार-प्रसार भी होता था।
बताया जाता है कि उस समय विभाग द्वारा विभिन्न विकास खंडों से स्वयं सहायता समूहों की सहभागिता सुनिश्चित कराई जाती थी। आकर्षक पैकेजिंग, उचित मूल्य निर्धारण तथा प्रचार-प्रसार की व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में लोग सखी समूहों की राखियां खरीदते थे। इससे ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि होती थी और उन्हें स्वरोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होते थे।इसके विपरीत इस वर्ष स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
रक्षाबंधन का पर्व निकट होने के बावजूद विकास भवन अथवा अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर सखी समूहों के स्टॉल लगाए जाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। विभाग की ओर से भी अब तक किसी विशेष अभियान, प्रदर्शनी अथवा विपणन कार्यक्रम की जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में यह प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या इस बार महिला स्वयं सहायता समूहों की मेहनत बाजार तक नहीं पहुंच पाएगी।
सूत्रों के अनुसार, वर्तमान उपायुक्त राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीसी-एनआरएलएम) का गैर जनपद से प्रतिदिन आवागमन (अप-डाउन) होना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि इसके कारण विभागीय गतिविधियों की नियमित मॉनिटरिंग प्रभावित हो रही है। हालांकि, इस संबंध में विभाग की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है और न ही किसी अधिकारी ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया दी है।ग्रामीण आजीविका मिशन का मूल उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना,उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना तथा स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाना है।
रक्षाबंधन जैसे बड़े पर्व पर हस्तनिर्मित राखियों की अच्छी मांग रहती है। यदि समय रहते विपणन की समुचित व्यवस्था नहीं की जाती है तो महिला समूहों की आय प्रभावित हो सकती है तथा उनके उत्पाद सीमित दायरे में ही रह जाएंगे।ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं का कहना है कि यदि पूर्व वर्षों की तरह प्रशासन सहयोग प्रदान करे और विकास भवन सहित प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर बिक्री स्टॉल स्थापित किए जाएं तो उनकी राखियों की बिक्री बढ़ सकती है। इससे उन्हें आर्थिक लाभ मिलने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर तैयार उत्पादों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
अब निगाहें जिला प्रशासन और एनआरएलएम विभाग पर टिकी हैं कि क्या रक्षाबंधन से पूर्व सखी समूहों की राखियों के विपणन के लिए कोई विशेष पहल की जाएगी अथवा इस वर्ष यह महत्वपूर्ण परंपरा ठंडी पड़ जाएगी। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाते हैं तो हजारों ग्रामीण महिलाओं को इसका सीधा लाभ मिल सकता है।
