आगरा श्रम विभाग की जांच पर बड़ा सवाल, क्या फर्जी रिपोर्ट से विधवा का हक छीना गया?
आगरा। क्या आगरा श्रम विभाग में सरकारी फाइलों का सच कागजों पर गढ़ा जा रहा है? क्या विभागीय जांच बिना मौके पर पहुंचे और बिना वास्तविक सत्यापन के पूरी कर दी जाती है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सदर तहसील के ग्राम गामरी निवासी विधवा विमला देवी के मामले में उपलब्ध दस्तावेज विभागीय जांच पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

विमला देवी ने वर्ष 2024 में भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड की योजना के तहत अपनी दो पुत्रियों के विवाह अनुदान के लिए आवेदन किया था। मामला सामान्य प्रक्रिया से आगे बढ़ रहा था, लेकिन 30 अगस्त 2025 की एक जांच रिपोर्ट ने पूरी कहानी बदल दी।
सबसे बड़ा सवाल—जिसकी मौत हो चुकी, उससे किसने की बात?
श्रम प्रवर्तन अधिकारी की जांच रिपोर्ट में उल्लेख है कि आवेदिका के पति जुगेन्द्र सिंह से मोबाइल पर बातचीत हुई और उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी कोई श्रमिक कार्य नहीं करती। इसी आधार पर आवेदन निरस्त करने की संस्तुति कर दी गई।
लेकिन दस्तावेज कुछ और कहते हैं।
परिवार के अनुसार जुगेन्द्र सिंह का निधन 12 अगस्त 2023 को हो चुका था, जिसका मृत्यु प्रमाणपत्र उपलब्ध है। यदि यह तथ्य सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति की मौत दो वर्ष पहले हो चुकी थी, उससे वर्ष 2025 में मोबाइल पर बातचीत कैसे दर्ज कर दी गई? क्या जांच वास्तव में हुई थी या केवल कागजों में पूरी कर दी गई?
मनरेगा रिकॉर्ड भी खारिज?
विमला देवी का दावा है कि वह वर्ष 2019 से लगातार मनरेगा में कार्य कर रही हैं। इसके रिकॉर्ड भी विभाग को उपलब्ध कराए गए। इसके बावजूद उन्हें श्रमिक न मानते हुए आवेदन निरस्त करने की संस्तुति कर दी गई। इससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
समाधान दिवस में शिकायत के बाद भी राहत नहीं
मामला जब सम्पूर्ण समाधान दिवस पहुंचा तो सहायक श्रमायुक्त ने आवेदन को पुनः प्रक्रिया में लाने के लिए बीओसी बोर्ड, लखनऊ को पत्र भेजा। विभाग ने बाद में आधार ई-केवाईसी का कारण बताया। आवेदिका ने 2 जुलाई 2026 को ई-केवाईसी भी पूर्ण करा दी, लेकिन इसके बाद भी भुगतान लंबित है।
सवाल जिनका जवाब जरूरी है
क्या विभागीय जांच वास्तव में मौके पर की गई थी?
मृत व्यक्ति से बातचीत दर्ज करने की जिम्मेदारी किसकी है?
यदि जांच रिपोर्ट में तथ्यात्मक त्रुटि है, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी?
सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी विधवा को योजना का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा?
अब निगाहें उप श्रम आयुक्त पर
यह मामला केवल एक विधवा के विवाह अनुदान का नहीं, बल्कि सरकारी जांच की विश्वसनीयता और जवाबदेही का है। यदि जांच रिपोर्ट में गंभीर तथ्यात्मक गलती हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। वहीं यदि आवेदिका योजना की पात्र है, तो महीनों से लंबित भुगतान तत्काल जारी किया जाना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आगरा श्रम विभाग इस मामले में जवाब देगा, या एक विधवा अपने अधिकार के लिए यूं ही दफ्तरों के चक्कर लगाती रहेगी?
