
….पण्डित प्रदीप शुक्ल
“जब संसद, अदालत, छात्र-आंदोलन और नागरिक अधिकार एक ही दिन में सामने हों, तब मीडिया का असली इम्तिहान शीर्षक नहीं, विवेक होता है”
मीडिया की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि वह क्या छापता है, बल्कि यह है कि वह क्या पहले और किस वजन के साथ छापता है। लोकतंत्र में खबर केवल सूचना नहीं होती; वह सार्वजनिक प्राथमिकताओं का नक्शा होती है। इसलिए जब एक ही दिन संसद के भीतर राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन विपक्ष की भावनाएँ गृह मंत्री अमित शाह तक पहुँचाने के लिए किरेन रिजिजू से कहते हैं, और विपक्ष गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति की मांग पर अड़ा रहता है, तब यह केवल संसदीय खिंचतान नहीं, मंत्रीगत जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। उसी दिन पश्चिम बंगाल सरकार कलकत्ता उच्च न्यायालय को बताती है कि राज्य के “anti-goonda” कानून अभी लागू नहीं हुए हैं; राहुल गांधी प्रयागराज में छात्र-आउटरीच कार्यक्रम जारी रखने की बात कहते हैं; बॉम्बे उच्च न्यायालय तरुण तेजपाल को 10 साल की सज़ा सुनाता है; और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वर्षगांठ पर हुए विरोध को लेकर एफआईआर दर्ज होती है। यह सब एक साथ घट रहा था। प्रश्न यह है कि सार्वजनिक विमर्श की अदालत में किसे अग्रिम पंक्ति मिले और किसे हाशिये पर धकेल दिया जाए।
आपके उद्धृत संस्करणों में यही असमंजस साफ दिखाई देता है: कुछ अख़बारों ने संसदीय जवाबदेही के असामान्य क्षण को प्रमुखता दी, कुछ ने अदालत और आंदोलन की खबरों को आगे रखा, और कुछ ने उन्हें ऐसे फ्रेम में समेट दिया मानो सार्वजनिक संस्थाओं की बहस से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेशों की पैकिंग हो। यह केवल शीर्षक का अंतर नहीं है; यह editorial hierarchy का अंतर है। जब कोई अख़बार यह तय करता है कि संसद में गृह मंत्री की उपस्थिति का सवाल, या राज्य द्वारा कानून के लागू न होने की स्वीकृति, या छात्र-आंदोलन के प्रति प्रशासनिक रुख—इनमें क्या पहले आना चाहिए, तब वह सिर्फ़ समाचार नहीं चुन रहा होता, लोकतंत्र के लिए प्राथमिकता-क्रम भी तय कर रहा होता है।
यही वह जगह है जहाँ मीडिया का विचलन शुरू होता है। विचलन का अर्थ केवल झूठ नहीं होता; कई बार वह चयनात्मक सच्चाई भी होता है। कोई खबर सच होते हुए भी इतनी छोटे फ्रेम में रख दी जाती है कि उसका सार्वजनिक अर्थ कमजोर पड़ जाए। कोई दूसरी खबर, जो व्यक्ति-केंद्रित विवाद, नैतिक तमाशे या भावनात्मक ध्रुवीकरण से अधिक कुछ नहीं जोड़ती, उसे अनावश्यक ऊँचाई दे दी जाती है। परिणाम यह होता है कि नागरिक को संस्थागत प्रश्नों की जगह राजनीतिक नाटक मिलते हैं। संसद का सवाल, न्यायालय का सवाल, प्रशासन की जिम्मेदारी और छात्र-हित—ये सब पीछे छूट जाते हैं; आगे रह जाता है कौन गया, कौन नहीं गया, कौन किससे नाराज़ है, और कौन किसे “संदेश” दे रहा है। यही लोकतांत्रिक संपादकीय लेखन के ह्रास का सबसे स्पष्ट संकेत है।
यह संकट केवल भारतीय नहीं है। Reuters Institute के 2025 Digital News Report के अनुसार वैश्विक स्तर पर समाचारों पर भरोसा 40 प्रतिशत पर स्थिर है, और यह पिछले दशक की गिरावट के बाद भी बेहद निचले स्तर पर बना हुआ है। इसका अर्थ साफ है: पाठक और दर्शक अब खबरों से केवल सूचना नहीं, समझ भी चाहते हैं; वे चाहते हैं कि पत्रकार सत्ता, विपक्ष, न्यायपालिका, पुलिस, विश्वविद्यालय और संस्थागत टकरावों को सार्वजनिक हित के ढांचे में समझाएँ, न कि उन्हें किसी राजनीतिक खेमे की भाषा में पैक करें।
भारतीय संदर्भ में यह अपेक्षा और भी संवैधानिक हो जाती है, क्योंकि प्रेस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक अधिकार का हिस्सा मानी गई है। प्रेस का काम सिर्फ़ राज्य की बात दोहराना नहीं, बल्कि राज्य से प्रश्न पूछना है; सिर्फ़ विपक्ष की भाषा दोहराना नहीं, बल्कि विपक्ष की रणनीति का भी परीक्षण करना है। जब संपादकीय पृष्ठ इस प्रश्न को छोड़कर केवल नैरेटिव, प्रतीक और ‘किसने किसे नीचा दिखाया’ वाले खेल में उलझ जाते हैं, तो वे पत्रकारिता के चौथे स्तंभ का नहीं, प्रचार की छत का हिस्सा बन जाते हैं।
इस दिन की खबरों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही था कि संसद के भीतर खुद सभापति को विपक्ष की भावना गृह मंत्री तक पहुँचाने का अनुरोध करना पड़ा—और विपक्ष गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग को लेकर अड़ा रहा। यह कोई सामान्य शोर नहीं था; यह संसदीय उत्तरदायित्व के संकट का लक्षण था। उसी समय पश्चिम बंगाल में सरकार ने उच्च न्यायालय में कहा कि उसका चर्चित anti-goonda कानून अभी लागू नहीं हुआ है, यानी कानून का राजनीतिक उत्सव और कानूनी वास्तविकता अलग-अलग थीं। ऐसे क्षणों में मीडिया का काम है कि वह इस अंतर को स्पष्ट करे, न कि उसे किसी साइड-स्टोरी में घोल दे।
इसी तरह, राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक दबाव और छात्र-आउटरीच की खबर भी केवल एक नेता की यात्रा नहीं थी; वह इस बात का संकेत थी कि छात्र-आंदोलन अब सत्ता के लिए असुविधाजनक सामाजिक सत्य बन चुका है। तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय की सज़ा भी केवल एक अपराध-कथा नहीं; वह न्यायालय, मीडिया-नैतिकता और सार्वजनिक स्मृति का प्रश्न था। और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वर्षगांठ पर विपक्षी विरोध के बाद दर्ज हुई एफआईआर यह बताती है कि असहमति और राज्य-बल के बीच तनाव अभी भी लोकतांत्रिक भारत की सबसे पुरानी और सबसे कठिन समस्या है। इन सबके बीच यदि खबरों का भार किसी एक नेता के बयान, किसी एक भावुक नैरेटिव या किसी एक “संदेश” तक सिमट जाए, तो पत्रकारिता का लोकतांत्रिक मूल्य घटता है।
मीडिया का यह संकट केवल राजनीतिक पक्षधरता का नहीं, संपादकीय साहस के क्षरण का भी है। संपादकीय लेखन तब मजबूत होता है जब वह सत्ता और विपक्ष, दोनों को संस्थागत कसौटी पर परखे; जब वह घटनाओं के शोर से हटकर उनके संवैधानिक अर्थ को पकड़े; और जब वह जनता को यह बताने की हिम्मत रखे कि असली खबर क्या है। आज के अनेक समाचार-पृष्ठों में समस्या यह नहीं कि खबरें नहीं हैं, समस्या यह है कि कई बार खबरें व्याख्या से वंचित हैं। वे छपती हैं, लेकिन अर्थ नहीं बनता। वे दिखती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक विवेक नहीं जगातीं। यही पत्रकारिता के ह्रास का असली रूप है।
इसीलिए ज़रूरत है कि संपादकीय पन्ने फिर से अपने मूल काम पर लौटें—संस्थाओं की निगरानी, सत्ता का परीक्षण, विपक्ष की रणनीति की पड़ताल, और नागरिक हित की रक्षा। पत्रकारिता का धर्म किसी खेमे की जीत नहीं, सार्वजनिक सत्य की रक्षा है। यदि संसद में असामान्य वाक्य बोला गया है, अदालत में असामान्य निर्णय आया है, छात्र-आंदोलन पर प्रशासनिक दबाव है, और राज्यों में कानून की वैधता पर प्रश्न उठ रहे हैं—तो अख़बार का पहला कर्तव्य है इन्हें प्राथमिकता देना, न कि इन्हें कमज़ोर, आवरण-भर, या वैचारिक शोर में दफन कर देना।
“जब खबर का चयन ही राजनीतिक पक्षधरता से संचालित होने लगे, तब लोकतंत्र सूचना नहीं, भ्रम से चलता है; और जब संपादकीय विवेक कमज़ोर पड़े, तब अख़बार जनता के लिए नहीं, सत्ता के लिए सुर्खियाँ गढ़ने लगते हैं।”
