
निर्मित द्विवेदी गोपाल
कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। पत्रकार की पहचान उसकी कलम से होती थी और उसकी ताकत सच से। लेकिन समय बदला तो पत्रकारिता के मायने भी बदलते नजर आने लगे। अब सवाल यह नहीं कि खबर कितनी महत्वपूर्ण है, सवाल यह हो गया है कि खबर से कितना फायदा हो सकता है।
कभी पत्रकार खबर की तलाश में गलियों की धूल फांकता था, अधिकारियों के दरवाजे खटखटाता था और जनता की आवाज सत्ता तक पहुंचाता था। आज कुछ जगहों पर खबर खुद पत्रकार को तलाशती है—कभी विज्ञापन के रूप में, कभी पैकेज के रूप में और कभी किसी खास ‘व्यवस्था’ के रूप में।
पहले संपादक की मेज पर संविधान और कानून की किताबें दिखाई देती थीं। अब कुछ जगहों पर उन्हीं मेजों पर रेट लिस्ट और पैकेज प्लान दिखाई देने लगे हैं।
पहले सवाल होता था—“जनता क्या जानना चाहती है?”
अब कहीं-कहीं सवाल होता है—“इस खबर में हमारा क्या फायदा है?”
व्यंग्य तो यह है कि कुछ लोग सुबह समाज सुधारक, दोपहर में सौदेबाज, शाम को स्वयंभू निष्पक्ष पत्रकार और रात में सोशल मीडिया के क्रांतिकारी बन जाते हैं।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
आज भी ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो बिना किसी दबाव के सच लिखते हैं। जिन्हें खबर बेचने से ज्यादा खबर की सच्चाई की चिंता होती है। जिनके लिए कैमरा सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि समाज की आवाज है। जिनकी कलम किसी व्यक्ति की जेब देखकर नहीं, बल्कि तथ्य देखकर चलती है।
याद रखना होगा—पत्रकारिता में कमाई बुरी नहीं है, लेकिन खबर को खरीद-बेच की वस्तु बना देना पत्रकारिता की आत्मा को कमजोर करता है।
पत्रकारिता अगर मिशन रहेगी तो समाज जागेगा, सवाल पूछेगा और व्यवस्था जवाबदेह बनेगी। लेकिन अगर पत्रकारिता सिर्फ धंधा बन गई, तो खबर बिकेगी, सच दबेगा और लोकतंत्र धीरे-धीरे तमाशा बन जाएगा।
इसलिए सवाल पत्रकार से भी है और पाठक से भी
आप खबर पढ़ रहे हैं… या खबर खरीद रहे हैं?
क्योंकि असली पत्रकार वह नहीं जो हर किसी के साथ खड़ा दिखाई दे, बल्कि वह है जो सच के साथ खड़ा रहने का साहस रखता हो।
पत्रकारिता मिशन है—और मिशन की कीमत तय नहीं होती।
