प्रोग्राम मैनेजर से लेकर ईएमई तक सब ‘एक्सपर्ट’, DM साहब की एंट्री से AC हुआ ठंडा
ब्यूरो रिपोर्ट रामकुमार कानपुर देहात
साहब, जरा चौंकिए मत… लेकिन अपनी AC वाली कुर्सी छोड़कर फील्ड में एक नजर तो मारिए। आपकी 102 एंबुलेंस सेवा में आजकल नया खेल चल रहा है। दिमाग और तकनीक भले पुराने खिलाड़ियों की हो, पर मैदान में उतरे हैं नए-नए ‘खिलाड़ी’।
‘प्रोग्राम’ का नया प्रोग्राम
सुना है प्रोग्राम मैनेजर साहब से लेकर इमरजेंसी मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव तक सब नई तकनीक से ‘सेवा’ कर रहे हैं। तकनीक ऐसी कि GPS भी शर्मा जाए।
सीन-1: कंट्रोल रूम
ईएमई साहब: “लो, केस क्लोज कर दो।”
कर्मचारी: “पर सर, एंबुलेंस तो अभी निकली भी नहीं!”
ईएमई साहब: “अरे, अभिलेख में पहुंच गई न? टारगेट तो पूरा हुआ। मरीज का क्या है, अगली बार देख लेंगे।”
एंबुलेंस किस गली से निकली, किस मरीज को ले गई, कागज पर सब ‘टाइम पर’ है। पर मरीज पूछे – “भैया, एंबुलेंस आई कब थी?” तो जवाब मिले – “अरे, अभिलेख में तो पहुंच गई थी!”
‘पुराने खिलाड़ी’ का नया दांव
चर्चा तो ये भी है कि जनपद में 10 साल से जमे एक ‘अनुभवी’ इमरजेंसी मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव साहब का दिमाग अब भी तरोताजा है। हालांकि पूर्व नोडल अधिकारी द्वारा उपरोक्त एमरजैंसी मैनेजमेंट एजुकेटिव के विरुद्ध अकबरपुर कोतवाली में एंबुलेंस संचालन में गड़बड़ी को लेकर मुकदमा दर्ज कराए जाने की बात भी सामने आ रही है। इसके बाद भी उपरोक्त दमदार एमरजैंसी मैनेजमेंट एजुकेटिव जिनके लिए कुछ एंबुलेंस कर्मियों के द्वारा कहा जा रहा है कि “एक तिवारी” “सब पर भारी” कहते हैं, उपरोक्त साहब का ‘तीव्र दिमाग’ अब 102 सेवा के संचालन में नई तकनीक से ‘अनियमितता की स्क्रिप्ट’ लिखने में जुटा है।
2025 वाला ‘फ्लैशबैक’: सरवन खेड़ा से छिबरामऊ तक
बात सिर्फ आज की नहीं है साहब। चर्चा ये भी है कि वर्ष 2025 में सरवन खेड़ा, कानपुर देहात लोकेशन पर ‘रैंचू साहब'(काल्पनिक नाम) के ‘खेल’ के भी चर्चे रहे। कहा जाता है कि 102 एंबुलेंस सेवा के वाहन के 42 फेरे ‘फर्जी’ लगवाने का मामला तब सुर्खियों में आया था।
अब सुनने में आ रहा है कि उपरोक्त ई,एम,ई साहब छिबरामऊ लोकेशन पर ‘सेवाएं’ दे रहे हैं। मजेदार बात ये कि एक समाचार पत्र में उनका बयान भी छपा बताया जाता है कि — “कंपनी खुद लगवाती है फर्जी फेरे”। यानी खेल सिर्फ ‘खिलाड़ी’ का नहीं, ‘कोच’ का भी है?
सीन-2: ऑफिस मीटिंग
नोडल साहब: “रिपोर्ट कैसी है?”
पीएम साहब: “सर, एकदम चकाचक। 100% रिस्पॉन्स टाइम, जीरो कंप्लेंट।”
नोडल साहब: “शाबाश! फील्ड का क्या हाल है?”
पीएम साहब: “सर, फाइल में सब ओके है। फील्ड में जाने की क्या जरूरत, खिड़की से ही सब दिख जाता है।”
अस्पताल के कागज बोलते हैं
साहब, एक बार अस्पताल के अभिलेखीय आंकड़े तो पलटिए। वहां 102 की एंट्री और डिस्चार्ज का टाइम ऐसा मिलता है कि आइंस्टीन भी टाइम-ट्रैवल पर रिसर्च छोड़ दें। मरीज भर्ती होने से पहले ही डिस्चार्ज, और एंबुलेंस निकलने से पहले ही पहुंच गई। इसे कहते हैं ‘एडवांस टेक्नोलॉजी’।
सीन-3: अस्पताल की OPD
डॉक्टर: “ये मरीज कब आया था?”
स्टाफ: “सर, 102 से आया था। एंट्री 10:05 पर, डिस्चार्ज 10:03 पर।”
डॉक्टर: “तो इलाज कब हुआ?”
स्टाफ: “सर, वो तो लॉगबुक में हो गया होगा।”
कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘सेवा’ कम, ‘आंकड़ा मैनेजमेंट’ ज्यादा हो रहा है? क्योंकि जब टारगेट पूरा करना हो और फील्ड में जाने से ‘थकान’ हो जाए, तो लैपटॉप पर ही ‘सेवा’ सबसे आसान है।
नोडल साहब, आप कहां हैं?
और हां, इस पूरे खेल के ‘रेफरी’ यानी नोडल अधिकारी साहब का क्या कहना। उनकी निगरानी में ‘फेयर प्ले’ चल रहा है। फील्ड विजिट की फाइल तो ओके है, बस फील्ड में जाना बाकी है। आखिर ऑफिस की खिड़की से भी तो बहुत कुछ ‘दिख’ जाता है।
क्लाइमैक्स: DM साहब की एंट्री
सीन-4: कलेक्ट्रेट
तभी अचानक दरवाजा खुलता है। DM साहब की एंट्री होती है, हाथ में 102 की ‘चकाचक’ मंथली रिपोर्ट और दूसरी हाथ में अस्पताल की OPD पर्चियों का बंडल। पीछे-पीछे मीडिया और दो-चार मरीजों के तीमारदार भी।
DM साहब: “नोडल साहब, ये क्या है? रिपोर्ट कहती है एंबुलेंस 8 मिनट में पहुंची, और OPD कहती है मरीज आया ही नहीं! तीमारदार कह रहे हैं 2 घंटे इंतजार किया। और ये 2025 वाला सरवन खेड़ा का ’42 फेरों’ का मामला क्या है?”
नोडल साहब: “सर… वो… तकनीक… सिग्नल वीक था…”
DM साहब: “तकनीक या तिकड़म? GPS का सिग्नल वीक था या नियत वीक थी? कल से हर एंबुलेंस की लाइव लोकेशन मेरे मोबाइल पर आएगी। और हां, जिस ‘पुराने खिलाड़ी’ और ‘जिन साहब’ की चर्चा है, उनकी पूरी फाइल, पिछले 10 साल की सर्विस बुक, अकबरपुर कोतवाली वाली FIR की स्टेटस रिपोर्ट और अब तक कानपुर देहात की तैनाती का ब्यौरा — सब मेरे टेबल पर चाहिए।”
पोस्ट-क्लाइमैक्स: AC और भी ठंडा
सीन-5: अगली सुबह
कलेक्ट्रेट के टाइपिस्ट बाबू के कंप्यूटर पर ‘निलंबन आदेश’ टाइप हो रहा है।
“तत्काल प्रभाव से… अनियमितता… कर्तव्य में लापरवाही… जांच तक मुख्यालय संबद्ध…”
उधर कंट्रोल रूम में ईएमई साहब पहली बार खुद एंबुलेंस की चाबी मांग रहे हैं: “आज मैं खुद जाऊंगा लोकेशन पर।”
कर्मचारी धीरे से: “सर, आज GPS ऑन कर लें?”
ईएमई साहब: “कर ले बेटा… आज DM साहब भी ऑन हैं।”
सीन-6: चाय की दुकान
ग्रामीण-1: “सुना है, अब एंबुलेंस टाइम से आ रही है?”
ग्रामीण-2: “हां भाई, जब DM साहब का ‘ऐप’ ऑन हो जाए, तो ‘टेक्निकल लोचा’ भी सीधा हो जाता है।”
ग्रामीण-3: “और वो ’42 फेरों’ वाले? सुना है छिबरामऊ में भी ‘स्क्रिप्ट’ लिख रहे हैं।”
ग्रामीण-1: “अरे, जब तक ‘कंपनी खुद लगवाती है’फर्जी फेरे वाला बयान है, तब तक खेल जारी रहेगा।”
आखिरी सवाल
गोलमाल था या ‘मैनेजमेंट’? तकनीक थी या ‘टेक्निकल नौटंकी’? 42 फेरे ‘फर्जी’ थे या ‘कंपनी की पॉलिसी’?
अब जब ‘रेफरी’ मैदान में उतर आया है, तो ‘खिलाड़ी’ भी खेल के नियम पढ़ने लगे हैं। क्योंकि साहब, AC की ठंडक तभी अच्छी लगती है जब फील्ड की रिपोर्ट भी गर्म न हो।
और दर्शक? वो मरीज अब भी वही है। फर्क बस इतना है कि आज उसे उम्मीद है कि एंबुलेंस कागज में नहीं, गली में आएगी — चाहे सरवन खेड़ा हो या छिबरामऊ।
नोट: यह लेख एक व्यंग्य है जिसका उद्देश्य व्यवस्था में सुधार हेतु ध्यान आकर्षित करना है। यह किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों पर तंज है। पात्र, संवाद और घटनाक्रम काल्पनिक हैं। चर्चा/आरोप/बयान के रूप में कलमकार उल्लेखित तथ्यों की पुष्टि नहीं करता। उपरोक्त लेख के माध्यम से कलमकार का किसी की छवि धूमिल करना उद्देश्य नहीं है
